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बृहस्पतिवार, 15 जुलाई 2010

हाँ मैंने माँ से झूठ बोला ..... आपसे भी .

 एक लम्बे अरसे के बाद आप सब से रूबरू हो रहा हूँ .

मेरी पूज्य माताजी का ४ जून की रात ९० वर्ष की आयु में स्वर्गवास  हो गया. 

पिछले एक साल से वे करीब करीब मेरे साथ ही थीं . मुंबई में या उसके  पहले और बाद गाँव में . उनकी बीमारी और उनके साथ उनके आख़री वक्त में साथ रहने का सौभाग्य मेरे लिए तथाकथित  कैरियर से बढ़ कर थे जो जनसेवा से जुडी नौकरियों का अंग होती हैं और कुछ अंतिम वर्षों में ही शीर्ष तक पहुँचाती हैं. साथ ही सेवा निवित्री के बाद पेंसन तथा अन्य लाभों में बड़ा अंतर लाती हैं  .न्यू योर्क नगर प्रशासन से अपने लम्बे संघर्ष के कारण वे भी मुझसे मुक्त होने का बहाना ढूंढ रहे थे और लम्बी छुट्टी की मेरी प्रार्थना अस्वीकार कर दी गयी . वे बीमार चल रही थीं और बीमारी भी अंतिम थी  .अतः अपनी निगरानी में इलाज और जन्म दायीनी की सेवा और सानिध्य उस ' लाभ ' को नगण्य ही बना सकते थे और उस सानिध्य के एवज में तुच्छ ही थे.  सेवा मुक्ति ही स्वीकार करनी पडी गो कि न्यू योर्क  नगर प्रशासनिक सेवा में ऐसे मामलों में लम्बी छुट्टियाँ इन कारणों में स्वीकृति होना सामान्य है और ना देना असामान्य अपवाद .         

माँ को बड़ी मुश्किल से समझा कर और मना कर गाँव से  उन्हें पिछले साल जून में मुम्बई ले आ पाया था क्योंकि ' पुरखन की ड्योढी ' उनके लिए छोड़ना जीवन में कुछ वृद्धि पाने की लालसा के बनिस्पत अपराध से कम कुछ नहीं थी  . 

प्रतापगढ़ ( उ .प्र ) के अपने गाँव से उन्हें इलाज के लिए मुबई ला पाने के लिए मुझे भी ' बालहठ ' पर उतरना पड़ा और उनकी ममता ने उनके हठ को हरा दिया . वे तो लगातार विरोध ही करती रहीं थीं के अब मेरे लिए जाने का वक़्त है इलाज का नहीं . बहरहाल इस पूरे दौरान मुंबई की सब सुख सुविधाओं के बावजूद उनका मन गाँव में ही  रहा .जीवन के आख़री पल वे पुरखों की ड्योढी पर ही बिताना चाहती थीं . 

सभी परीक्षण हुए इलाज भी पर निष्कर्ष तो पता चल ही गया था कि अब साल नहीं महीनों की बात रह गयी है .फिर भी आँखों की मोतिया बिन्द का आप्रेसन इसी बहाने हो गया  ,जो कि दस साल पहले ही हो जाना  चाहिए था और वे अपने हठ के चलते अर्ध अंधत्व ही जी रही थीं .इसके बावजूद भी कि वे पहले सिनेमा  और फिर टी वी  पर सीरियल सिनेमा देखने की बहुत ही शौक़ीन थीं और वह भी बंद हो चुका था . फिर मुबई में बडे LCD टीवी और सराउंड साउंड में उन्होंने ६ महीने सब का खूब आनंद उठाया . ( पहले तो उन्हें समझ ही नहीं आया और पूछा कि तू सिनेमा बना रहा  है कि घर में ही सिनेमा खोल लिया है ) वे पूरा वक्त करीब करीब टीवी ही देखती थीं और हम उनका आनंद देख निहाल होते रहते थे .


मेरे सेवक सहायक ड्राईवर और आहार प्रदाता ' प्रेम ' की सेवा से तो इतनी अभिभूत थीं कि उसे हमेशा अपनी नज़रों के ही सामने देखना चाहती थीं . और वह २२ साल का लड़का भी आनंद विभोर हो दादी दादी करता उन्हीं से चिपका रहता था और उनके स्नेह से अभिभूत . हमें तो सब पता चल गया पर माँ से नहीं बताया गया उनकी बीमारी के बारे में .कुछ करने को नहीं रह गया था .लेकिन इस बार उत्तर भारत की ठंढी के चलते उन्हें फरवरी के आख़री हफ्ते ही गाँव वापस ला सका . 

उनके पास बस कुछ महीने ही बचे थे . लीवर की खराबी कैंसर के चलते खाना पीना कम कर धीरे धीरे उनकी वृद्ध क्षीण काया को कमजोर करती जा रही थी . बीच में अप्रैल के आखिर में दो हफ़्तों के लिए मेरा अमेरिका जाना बहुत जरूरी था  पर हिम्मत नहीं पड़ रही थी . कभी भी कुछ हो सकता  था . मेरा असमंजस देख उन्होंने कहा अपना कर्म करो और इस उम्र में मेरी चिंता मत करो ,जाओ .मुझे अस्थिर पा हिम्मत से कहा " तू जा ,तेरे लौटने तक मैं कहीं नहीं जाने वाली " , और अपना वचन निभाया . वहां से सुबह शाम मैं फोन कर हाल लेता रहा गो की उनकी आवाज़ क्षीणतर  होती जा रही थी और बढ़ती कमजोरी का अहसास साफ झलकता रहता था .  २० मई को मेरे लौटने पर वे खुश हुईं , बातें की , मुश्किल से ही सही .फिर  २५ मई से अर्ध बेहोशी फिर बेहोशी में चली गयीं .बड़ी मुश्किल से किसी तरह कुछ जूस वगैरह पिलाते रहे . जैसा  डाक्टरों का आकलन था कि  वे भीषण दर्द के पहले ही कमजोरी और  आयु  के कारण मुक्ति पा लेंगी और हमें अपने दर्द को नहीं उजागर कर पाएंगीं वैसे ही हुआ . ४ जून की शाम से ही उनकी हालत बिगड़ने लगी . रात साढ़े बारह से हिचकियाँ शुरू हुईं और एक बजे अवसान.

अब चिकित्सकीय जगत के सिद्ध ही बता सकते हैं कि क्या सच है कि जैसे बुझने के पहले जिस तरह अचानक शमा की रोशनी तेज हो जाती है वैसे ही मानव जीवन में भी होता है ? मैंने तो साक्षात् अनुभव किया . अंतिम वेला में उन्होंने मृत्यु से पहले अपनी दोनों आँखें पूरी तरह खोलीं और निहारा जैसे उन्हें कुछ हुवा ही ना हो .शायद दो तीन सेकण्ड के लिए . मैंने उन्हीं क्षणों में एकसाथ उनकी आँखों में प्रेम स्नेह वात्सल्य ममता आभार और आशीष सभी के दर्शन किये .फिर आँखें मूँद लीं और सिर्फ तीन हिचकियाँ  और फिर हमेशा के लिए विदा . 

हमारी आँखे तो रोयीं पर मन में एक संतोष भी था .डाक्टरों का कहना था कि वक्त आ गया था कि उनका और जीवन कैंसर के दर्द की उस सीमा में उन्हें प्रवेश कराता जहाँ असहनीय पीड़ा उनका इंतजार कर रही थी कि जिसे देख पाना भी हमारे लिए विदारक होता , उनके लिए तो झेल पाना श्राप .माँ जन्म से ही भाग्यशाली थी शायद इसीलिये उसने उस दर्द की सम्भावना से पहले ही विदा ले ली . लम्बा जीवन जीया और हंसते खेलते संसार छोड़ दिया.

अब वह बात करूंगा जो मैंने माँ से झूठ बोला और जान बूझ कर .  आप सब सहित ,अपने भारत के मित्रों परिजनों सहित सब से .अपनी पहली जनवरी २०१० की पोस्ट ' भारत चीन अमेरिका पुत्र ' पर मैंने अपने दादा बनने की बात लिखी थी . पुत्र रणजीत और पुत्रबधू मौली के पुत्र जन्म की बात लिखी थी . जबकी सच्चाई यह थी कि उन्हें सौभाग्य ने पुत्री से नवाज़ा था और मैं पौत्र नहीं पौत्री का दादा बना था .

क्यों किया मैंने ऐसा ? मेरे व्यक्तिगत आनंद का कारण शायद पौत्री का जन्म पौत्र से भी ज्यादा सुखदाई था . कारण था तो यह कि सिर्फ माँ को जीवन के आख़िरी वक्त आनंदित देखना चाहता था .जिन्हें ना सिर्फ पुत्र जन्म की ही खबर आनंदित कर सकती थी बल्कि पुत्री के जन्म की खबर अत्यंत दुखी भी . वे बहुत प्रसन्न हुयी थीं और प्रपौत्र जन्म की खुशी में ' बरही ' का आयोजन कराया और खुद भी याद  कर कर तमाम ' सोहर ' भी गाये और ' लीड सिंगर ' बनी रहीं .  

अगली पोस्ट पर अपने व्यक्तिगत  और पारिवारिक जीवन के पैंतीस वर्ष पूर्व के काल खंड में ले चलूँगा जब मेरी दूसरी पुत्री का जन्म हुवा था . उसके बाद जो पारिवारिक घटनाएँ हुईं , जो उस मुकाम तक ले गयीं जिसमे सैधांतिक कारणों से हम माँ बेटे ढाई सालों तक आपस में संवाद तक ना कर सके ,बोलचाल बंद रही माँ की ओर से और मेरे अमेरिका गमन या पलायन का कारण भी बनीं .

यह सब लिखने का कारण व्यक्तिगत ना होकर सामाजिक है और हम भारतीयों के सोच संस्कार और परंपरा जन्य व्यवहार का एक हिस्सा भी . नारी विमर्श का विषय भी और आज के परिप्रेक्ष में भी हमारी रूढिगत सोच समझ के विश्लेषण का विषय भी .पुरुष प्रधान समाज  और पितृसत्तात्मक व्यवस्था के सूत्र और स्रोत ग्रंथि का मनोवैज्ञानिक अध्ययन भी . माँ में एक एक स्नेहिल सहिद्रय वात्सल्यमय व्यक्तित्व का निवास था फिर भी वह जो थीं वे वैसी क्यों थीं ? यह गुत्थी क्या थी ? और वे ही नहीं खास कर पूरे एशिया भर में , भारत ,पाकिस्तान ,बांग्लादेश , चीन सहित सभी मुल्कों में आज भी सामाजिक ताने बाने में हम क्यों पुत्र की ही अभिलाषा संजोये रहते हैं ? प्रश्न विकट भले हो उत्तर शायद उतना जटिल नहीं . वही प्रयास करूँगा अगली पोस्ट पर .       
 




22 टिप्पणियाँ:

अभिषेक ओझा ने कहा…

माताजी को श्रद्धांजलि !

ललित शर्मा ने कहा…

झूठ बोलकर माँ की आत्मा को तसल्ली देना भी ठीक था।
बढे बूढे अपने वंश को आगे बढते देखना चाहते है।
बस इतना सा ही स्वार्थ रहता है उनका।

अच्छी पोस्ट आभार

Sunil Kumar ने कहा…

सच्चाई से लिखी गयी रचना को नमन अच्छी लगी

अजय कुमार ने कहा…

सबसे पहले तो आपके माता जी के निधन पर शोक व्यक्त करता हूं ।
आपने उनकी ठीक से देखभाल की ,अच्छा लगा ,बहुत कम लोग आजकल ऐसा कर पाते हैं ।
रही बात पुत्र के चाहत की तो ,हमारे बुजुर्ग लोग जिस समय की सोच रखते हैं उस समय लड़कियां सिर्फ शादी करके दूसरे घर जाती थीं ,अपने पैर पर खड़ी नहीं होती थीं ,आज ऐसा नहीं है ।
इसे उस समय के अनुकूल कह सकते हैं ।बाकी अगले लेख में आप इसे स्पष्ट करेंगे ही तो मेरा भी मार्गदर्शन होगा ।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

आपकी भावुक स्वीकारोक्ति हृदय छू गयी। आपको बात कचोट रही थी तो उसका व्यक्त करना उचित था पर माँ को प्रसन्न रखने हेतु यह झूठ कदाचित झूठ की श्रेणी में नहीं आयेगा वरन एक संबन्ध का सफल निर्वहन कहलायेगा।

seema gupta ने कहा…

बेहद सम्वेदनशील अभिव्यक्ति, भावुक कर गयी......"इश्वर आपकी पूज्य माता जी की आत्मा को शांति प्रदान करे" और आपको इस दुःख की घड़ी में हौंसला और सहनशीलता का वरदान दे.

regards

नीरज गोस्वामी ने कहा…

राज साहब अरसे बाद आपको ब्लॉग पर देख कर कितनी ख़ुशी हुई बयां नहीं कर सकता...माँ की मृत्यु के विवरण ने जहाँ आँखें गीली कर दीं वहीँ ये जान कर संतोष हुआ के अंतिम समय में वो कष्ट झेल कर विदा नहीं हुईं...वो दैहिक रूप में हमारे बीच नहीं हैं तो क्या हुआ हमारी स्मृतियों और दिल में सदा रहेंगीं...
आपको पढना हमेशा एक नया अनुभव होता है आपकी भाषा और विचार दोनों प्रभावित करते हैं इसलिए आपकी अगली पोस्ट का बेताबी से इंतज़ार है...
नीरज

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

सबसे पहले तो आपके माता जी के निधन पर मेरा हार्दिक शोक व्यक्त करता हूं । माताजी को प्रणाम और श्रद्धांजलि !
आपने झूठ बोलकर कोई गलत नहीं किया है ... क्यूंकि उस परिस्थिति के परिप्रेक्ष में वो सही था ... माँ की आत्मा को तसल्ली देना भी ठीक था ।
मेरी अपनी एकमात्र संतान एक बेटी है और मैं उसे पाकर बहुत खुश हूँ, मैं नहीं मानता कि लड़का, लड़की से बढ़कर होता है ... पर बात अपनी मान्यता की नहीं है, उस परिस्थिति में अपनी मान्यता दिखाने से ज्यादा ज़रूरी था वो झूठ ... मेरे ख्याल से कोई भी औरत इस झूठ को समझ सकती है और उसको उसके सही परिप्रेक्ष में देख सकती है ...
माताजी खुशी खुशी गई ... ये बहुत बड़ी बात है ...
आप अपनी मान्यता के हिसाब से उस छोटी सी जान को अपना पूरा प्यार और देख रेख दीजिए ..

बस हम तो यही उम्मीद करेंगे कि धीरे धीरे हमारे समाज से बेटे-बेटी का फर्क हट जाये ...

महफूज़ अली ने कहा…

माताजी को श्रद्धांजलि ... आपकी यह भावुक कर देने वाली पोस्ट बहुत अच्छी लगी....

Sanjeet Tripathi ने कहा…

mataji ko meri shraddhanjali...

aise mauke par kaha gaya jhooth., jhooth nahi kahlata.....

ham sara kissaa padhnachahunga....

सत्यप्रकाश पाण्डेय ने कहा…

माताजी को श्रद्धांजलि !
बेहद सम्वेदनशील और भावुक अभिव्यक्ति

सत्यप्रकाश पाण्डेय ने कहा…

माताजी को श्रद्धांजलि !
बेहद सम्वेदनशील और भावुक अभिव्यक्ति

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

राज़ जी ,
माँ जी के निधन पर आपके दुःख में साथ हैं .........
रचना भावुक कर गयी .....सच्च कहा, '' कि जैसे बुझने के पहले जिस तरह अचानक शमा की रोशनी तेज हो जाती है ''
इस बात को मैंने भी कई बार अनुभव किया .....अंतिम वक़्त में रोगी बातचीत और भोजन भी ठीक करने लगता है और हम समझ बैठते हैं वो ठीक हो रहा है .........!!

माँ की कई मासूम बातों का जिक्र सुखकर लगा ......
पहले तो उन्हें समझ ही नहीं आया और पूछा कि तू सिनेमा बना रहा है कि घर में ही सिनेमा खोल लिया है ... ):

अंतिम क्षणों में आप उनके पास रहे ,उनकी सेवा की यही बहुत बड़ी बात है......

और हाँ पोते की बात माँ तक तो ठीक थी पर हम ब्लोगरों से झूठ बोलने का क्या औचित्य ....?

डा० अमर कुमार ने कहा…


चलो. आज आपको पकड़ पाया, पूरी पोस्ट पढ़ने पर शब्दों की मुक्का-लात होगी !
अम्मा का दृढ़ चरित्र हमेशा याद रहेगा । सादर नमन

RAJ SINH ने कहा…

' हीर ' जी ब्लोगरों से अपनी व्यक्तिगत खुशी बांटना चाहता था ,क्योंकि हम सब भी तो एक परिवार ही हैं पर झूठ इस लिए बोलना पड़ा कि भूले भटके ही सही कहीं किसी के द्वारा सच माँ तक न पहुँच जाये क्यों कि कई पारिवारिक मित्र भी मेल से मेरा लिखा पढ़ते हैं और अगर सच उन तक उजागर हो जाता तो .....? क्योंकि मुम्बई में उनमे से कई घर भी आते थे माँ से भी मिलते थे .और फिर उनका आनंद शायद खतरे में पड़ जाता और मैं कोई मौका नहीं लेना चाहता था .कुछ महीनों की ही तो बात थी .सच तो बताना ही था.

Roshni ने कहा…

राज जी इसमें कोई शक नहीं कि आप ने रिश्तों कि अहमियत को बखूबी समझा है

ये अलफ़ाज़ सिर्फ अल्फाज नहीं आपके दर्द भी है ..

सातों जहान में माँ का दर्जा कोई भी नहीं ले सकता ..



इसलिए ...



रब ने माँ को क्या खूब सिफ़ा दी

उसकी दुआ पे हजारों मुश्किले हटा दी

हर मजहब ने माँ कि कुछ इस तरीके मिशाल दी

कि जन्नत उठा के माँ के चरणों में डाल दी ..

Rajendra Swarnkar ने कहा…

आदरणीय राज सिंह जी
नमस्कार !
पूज्य माताश्री की स्मृतियों को प्रणाम !

मां है मुहब्बत का नाम !
मां को हज़ारों सलाम !!


बहुत मर्मस्पर्शी प्रसंग है ।
परमात्मा ने मां'जी को अपने पास ज़रूर बुला लिया , लेकिन वे आपसे कभी दूर नहीं हो सकतीं ।

मेरी एक मुसलसल ग़ज़ल के दो शे'र आपको नज़्र कर रहा हूं …

तेरे दम से है रौनक़ घर मेरा आबाद है अम्मा !
दुआओं से मुअत्तर है ये गुलशन शाद है अम्मा !
तेरे क़दमों तले जन्नत , दफ़ीने बरकतों के हैं
ख़ुदा अव्वल , तुम्हारा नाम उसके बाद है अम्मा !


शुभकामनाओं सहित …
- राजेन्द्र स्वर्णकार
शस्वरं

Babli ने कहा…

माताजी को मेरा शत शत नमन और श्रधांजलि अर्पित करती हूँ!

Umra Quaidi ने कहा…

सार्थक लेखन के लिये आभार एवं “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।
जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव भी जीते हैं, लेकिन इस मसाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये यह मानव जीवन अभिशाप बन जाता है। आज मैं यह सब झेल रहा हूँ। जब तक मुझ जैसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यही बडा कारण है। भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस षडयन्त्र का शिकार हो सकता है!
अत: यदि आपके पास केवल दो मिनट का समय हो तो कृपया मुझ उम्र-कैदी का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आप के अनुभवों से मुझे कोई मार्ग या दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये।
http://umraquaidi.blogspot.com/
आपका शुभचिन्तक
“उम्र कैदी”

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

हे ईश्वर!

ZEAL ने कहा…

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यदि एक झूठ किसी को पल भर की भी ख़ुशी दे सकता है , तो बुरा नहीं है वो झूठ। वृद्ध माँ के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए आपने ऐसा कहा , जो सही था। शायद मैं अगर आपकी जगह होती तो यही करती।

आभार।

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Rajeev Dubey ने कहा…

कल उन्नाव में एक कवि सम्मेलन में था, कुछ कविताएँ सुनाईं और कई सुनीं । कुछ कवियित्रियों एवं एक नन्ही सी बच्ची ने छेड़ी थी यह बात - "मैं बेटी - मैं एक सौगात ...।"

सुने बटोरे आँसू थोड़े - एक विचित्र विरोधाभाष ।

एक युग गुजर गया, कुछ रह गया कुछ बदल गया।

श्रद्धांजलि के साथ।