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बुधवार, 8 फरवरी 2012

NOW ..... A FINAL WAR !

आदरणीय डा . सुब्रमण्यम स्वामी जी ,
मैं आपके कार्य ,व्यक्तित्व ,निष्ठा ,राष्ट्र प्रेम ,विद्वता ,सतत संघर्ष और समर्पित देश हित का परम प्रशंसक रहा हूँ .मुंबई में 5 फरवरी 2012 के ' मनीलायिफ ' द्वारा आयोजित कार्यक्रम में मैं महीनों पहले रेजिस्ट्रेसन करा हाजिर हुआ .हमेशा की तरह आपके वक्तव्य से  इस बार भी दिशा ,ज्ञान ,राजनैतिक घटनाक्रम और खास कर 2G विषय पर विशेस जानकारी के द्वारा अपनी जानकारी बढ़ायी .आपको सुनना हमेशा एक अनुभव रहा और करीब बीस साल पहले न्यू योर्क में आपसे व्यक्तिगत संपर्क होने पर आपके व्यक्तित्व की विशालता का प्रशंसक भी .कुछ एक साधारण मुद्दों को छोड़ ( पूर्णतः सिर्फ दो मूर्ख ही हमेशा एकमत हो सकते हैं :) ) ,आपकी राजनितिक राष्ट्रीय विचार और राजनीती और ध्येय की स्पष्टवादिता का मैं समर्थक रहा हूँ  .जनता दल ( यू ) मुंबई का अध्यक्ष भी हूँ , यह मान कर कि अगर अच्छे लोग राजनीती में नहीं आयेंगे तो राजनीती बदमाशों की ही गुलाम बनी रहेगी  .

उस सभा में जब आपके बाद IAC के मयंक गाँधी को सह वक्ता पाया तो घोर आश्चर्य हुआ  .आप भी पहले कह चुके हैं की अन्नाजी आदरणीय हैं लेकिन अन्नाजी सहित कुछ अपवादों को छोड़ बाकी IAC की ' टीम अन्ना  नक्सलियों  का झुण्ड ' है , और काश्मिरी अलगाववादियों आतंकियों की समर्थक जो कश्मीर को थाली में प्रस्तुत कर पाकिस्तान को दे देना चाहती है . मेरा भी यही निष्कर्स है . प्रशांत भूषन जैसे लोगों ने कोई शंका की गुन्जयिस भी नहीं छोडी है .

IAC से शुरुवात से ही जुड़ा होने के कारण जब इन गद्दार और भ्रष्ट  तथाकथित नेताओं ( टीम अन्ना )  का भ्रष्टाचार के खिलाफ ' मुखौटा ' लगा उनका असली कुत्सित उद्देस समझा तो विरोध भी किया .जैसे की फरवरी 2011  की मुंबई में काला घोडा की IAC की आयोजित सभा ,जिसकी अध्यक्षता मयंक गाँधी कर रहे थे तथा अरविन्द केजरीवाल मुख्य वक्ता .अपने भाषण में केजरीवाल ने जन लोकपाल पर कम डा. विनायक सेन ( नक्सल गतिविधियों में संलिप्तता के चलते जिन्हें आजीवन कारावास मिला था ) की जोरदार वकालत कर रहे थे और एक संवैधानिक  अदालत द्वारा दी गयी सजा को पाप बता रहे थे ,ये तो संविधान की अवमानना के अपराधी हुए  .साथ ही बिहार के मुख्यमंत्री श्री नितीश कुमार द्वारा सरकारी कर्मचारियों की आय से अधिक संपत्ति पाए जाने पर संपत्ति की जब्ती कर, उसे जन कार्यों के उपयोग के  लिए ,जैसे स्कूल अस्पताल वगैरह के लिए , इस्तेमाल को काला जालिमाना द्रकोनियन कानून बता रहे थे .मैंने विरोध किया की IAC के मंच का उपयोग सिर्फ भ्रष्टाचार के विरुद्ध लाये जाने वाले मुद्दों तक ही सिमित रहे ,भले हमारे व्यक्तिगत विचार कुछ भी हों .साथ ही यह भी कहा की स्वयं अन्नाजी ऐसे कानून लाने का पुरजोर समर्थन करते हैं तथा नितीश जी की प्रशंसा भी की है इसके लिए तो आप उनके स्टैंड के खिलाफ IAC के  मंच से ही ऐसी बातें करने की हिम्मत कैसे कर रहे हैं . मयंक गांधी जो केजरीवाल के खासमखास हैं ( नियुक्त ,चुने नहीं . क्योंकि IAC में कोई आतंरिक लोकतंत्र नहीं है और उसे इन लोगों ने अपनी जेब में रखा है ) ने मुझे चुप कराने की कोशिस की लेकिन मैंने दृढ़ता से केजरीवाल से कहा की अपने मुद्दों के लिए वे IAC का इस्तेमाल नहीं कर सकते और सीमा में ही बोलें .वे संभल गए फिर उन मुद्दों पर कुछ नहीं कहा . 

स्वयं मयंक गाँधी भी जब अपनी जिस पारिवारिक लिस्टेड बिल्डर कंपनी के डाईरेक्टर थे ,उस पर ग्राहकों को ठगने का खुला आरोप है और आज भी उसने लिखित आश्वासन के बाद भी अपने अनगिनत ग्राहकों को फ्लैट देना तो दूर पैसा भी नहीं लौटाया है .स्वयं मयंक गाँधी ने इसे अपने ब्लॉग पे लिखा और यह भी लिखा की इस बात की जानकारी वे अरविन्द केजरीवाल को दे चुके हैं और इसके बावजूद केजरीवाल ने उन्हें मुंबई के IAC के नेत्रित्व पर बना  रहने  के लिए कहा है .ये  बात दूसरी  है की अपने चमचों के अलावा तीखी प्रतिक्रियाएं  आने  पर उन्होंने  जल्दी  ही वह  पोस्ट  निकाल  दी .( फोटो कापी उपलब्ध है ) इसीलिये आपके मंच से जब मैंने मयंक गाँधी को ' सम्माननीय सहवक्ता '  पाया तो अपना  ऐतराज  व्यक्त  किया बुलंदी  से  , आपको ही संबोधित  कर,आयोजकों  के विरोध के बावजूद भी . क्योंकि ऐसे लोगों की ' सम्माननीय  उपस्थति ' और उनके द्वारा ,जो IAC के मुखौटे में मुंबई के बिल्डर लोब्बी  के चेहरे  और दलाल हैं  , उनसे आपको पवित्र राष्ट्र ध्वज समर्पित किया जा रहा था . 

डा. स्वामी जी मैं सपने में भी आपका अनादर नहीं कर  सकता  और आज की राजनीती में मेरे  लिए आप सब  से बड़े और एक सम्माननीय  ' चेहरा ' हैं .अतः  आप  से निवेदन  है कि किसी  भी हालत में , आप मेरे इस कर्तव्य को अपनी सभा का अनादर  न  मानें  न ही आप इसे सभा बाधित  करने या  व्यवधान  करने की कोशिश ही समझें  .( इसी को आधार बना मुझे IAC मुंबई से निकाल दिया गया है . लेकिन कर्तव्य मुझे ऐसी किसी सदस्यता से ज्यादा महत्वपूर्ण है . वैसे भी समझदार जानकार लोग खुद IAC से अलग हो गए हैं या मेरे जैसे विरोध करने वाले निकाल दिए गए हैं . बहुत कुछ अच्छे देश भक्त अभी भी हैं लेकिन कुंठित और निराश ) .अगर  आप को या किसी को भी ऐसा  लगा हो कि मैंने कुछ गलत किया है तो मैं उसके  लिए क्षमा  और आपकी माफी  का हक़दार  माना  जाऊं ,यह निवेदन है  .क्योंकि इरादा सिर्फ यह था की आज की राजनीती के सब से सम्मानित व्यक्तित्व की शान न कम होने पाए .

आपने ONE MAN ARMY की हैसियत से इस राष्ट्र को जो ऐतिहासिक विजय दिलाई है वह असंभव से संभव कर पाना आप के अथक , निरंतर संघर्ष के बिना संभव ही न हो पाता . यह राष्ट्र अपने इस ' राष्ट्र पुत्र ' पर अभिमान कर रहा है और इस देश की जनता आपकी सिर्फ चिर रिणी ही नहीं रहेगी आपमें एक सेनापति भी देख रही है .आपके साथ इस देश को आना ही होगा .लेकिन गद्दारों और सत्ता के दलालों से सावधान रहें क्योंकि इन लोगों ने अन्नाजी के आन्दोलन का अपहरण कर, देश के क्रोधित भ्रष्टाचार के खिलाफ उभार को , लगातार थका कर और फिर अपने असली चेहरे की पहचान दे ठंढा कर दिया और आज का युवा विभ्रमित है , की क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले ये चेहरे असली हैं ? तमाम सच्चे लोग इन्हें पहचान घरों को लौट गए हैं . IAC के नाम पर चंदा उगाही कर अपने निजी NGO खातों डाल रखा है इन्होने और हिसाब मांगने वालों की पिटाई भी की है . कुछ लोगों की टिप्पणी थी की ' खाता न बही ,केजरीवाल कहे वो सही ' .  इस आन्दोलन को और स्वयं अन्ना जी को इन धूर्तों ने सुनियोजित तरीके से अवसाद ग्रस्त कर डाला है .

वैसे आपकी बुद्धि और विवेक पर मुझे पूरा भरोसा है कि ये लोग आपका ' उपयोग ' नहीं कर पायेंगे क्योंकि आप ' भोले अन्ना ' नहीं है .जानता हूँ कि राजनीती में विजय के लिए समझौते भी करने पड़ते हैं .लेकिन मैं आपमें प्रसिद्द अमेरिकी राष्ट्रपति FDR की बुद्धिमत्ता भी जानता हूँ कि आप इनका इस्तेमाल कर रहे होंगे ये आपका नहीं कर पायेंगे .आपसे ज्यादा कौन जानता है कि अप्रैल २०११ के ' जंतर मंतर ' पर हुए अन्नाजी के पहले उपोषण पर इन्हीं ताकतों ने सत्ता का ' क्षद्म दलाल ' बन आप जैसे देश भक्तों को आने भी नहीं दिया था शामिल होने  . 

आपसे निवेदन है की 30 जनवरी 2011 के दिन दिल्ली के रामलीला मैदान में भ्रष्टाचार के खिलाफ लाखों की जनता  और इकट्ठी हुयी सभी ताकतों को एकजुट कर , आप इस राष्ट्र के इतिहास के ' महानतम ' युद्ध को जीत में बदल डालें और देश भ्रष्टाचार से मुक्त ,सुशासित ,और जैसे ' महर्षि ' कलाम ने अपनी किताब...... ' INDIA VISION -2020 ' में , देश को एक सपना दिया है ,यह देश  ' सारे जहाँ से अच्छा '  बने . 
आपको यह याद दिलाने की जरूरत नहीं की वही ' सत्ता की दलाल गद्दार ताकतें ' आप के होते फिर से किसी जन आन्दोलन को तोड़ न सकें और ' लुटेरों ' के खिलाफ अब जो लडाई हो वह निर्णायक हो . 

A FINAL WAR ! 

देश सहित आपका चिर रिणी 
राजकुमार सिंह         


बुधवार, 25 जनवरी 2012

' गणतंत्र दिवस ' पर चुनावी ' गण कर्तव्य ' !

जनता दल ' यू ' के मुंबई अध्यक्ष के नाते मैं और हमारी पार्टी भी मुंबई महानगर पालिका के चुनाव में हिस्सा ले रहे हैं .

अपने व्यक्तिगत और सामाजिक मत कई बार ब्लॉग पर और टिप्पणियों में ही लिख चुका हूँ और सोसल वेबसाईट ' फेसबुक ' और ट्विटर वगैरह पर . कोई भी जान सकता है .वे दस्तावेज हैं और नेट द्वारा किसी व्यक्ति के बारे में आजकल काफी कुछ और भी जाना जा सकता है , पार्टी का स्टैंड और काम भी , उम्मीद करता हूँ कि आप में से जानकार लोग काफी सब जानते होंगे .वैसे जमीनी हकीकत , मैं एक सवाल के जबाब में प्रेस कांफ्रेंस में कह चुका हूँ कि , " आज की स्थिति में कोई भी पार्टी दूध की धुली नहीं है ,हमारे सहित .लेकिन हम खुद को ' Best  amongst  worsts  ' तो कह ही सकते हैं और शायद बेहतर विकल्प हैं ".

मेरा व्यक्तिगत मत है कि स्थानीय निकायों के चुनाओं में ' पार्टी विहीन ' चुनाव होने चाहिए क्योंकि विदेश निति ,आतंरिक और बाहय सुरक्षा सहित या उस जैसे सवाल निकायों के मुद्दे नहीं इस लिए राजनैतिक पार्टियों के नहीं बल्कि सिर्फ स्थानीय नागरिक सुविधाओं के ही मुद्दे ही आधार बने जन सुविधाओं की कसौटी पर . अतः अच्छे इमानदार सेवाभावी नागरिकों के बीच ही चुनाव ' अराजनैतिक ' हों . ( इस मामले में मायावती जी के भी यही विचार हैं :) ) .लेकिन जमीनी सच्चाई कुछ और है और चुनाव आयोग ने भी उसे स्वीकार किया है ,अतः ' पार्टी विहीन ' स्थानीय निकाय चुनाव सिर्फ ' परिकल्पना ' ही है .हकीकत यह है कि निकायों में भी ' धन ' इतनी ज्यादा मात्रा में है और भ्रष्टाचार की इतनी महत गुन्जायिश कि भ्रष्ट तंत्र द्वारा राजनैतिक भ्रष्ट दोहन ,जो इस देश का दुर्भाग्य है ,उस में समा गया है ,और उसे चुनौती दिए बिना सुधारा भी नहीं जा सकता .और स्थानीय निकाय के चुनाव आगे आने वाले ' स्वच्छ या भ्रष्ट ' राजनीति की नियति तय करते हैं और उसके चरित्र को भी परिभाषित . और इस अनिवार्यता में जीतने के लिए भी ' धन बल ' और ' बाहुबल ' के जबाब में ' जन बल ' को जागृत करना ही पर्याय है और हमारे लिए एकमात्र विकल्प भी  .लेकिन हो कैसे ?


अपने अनुभव से कह रहा हूँ कि मिडिया के स्वरुप को देखते , उनके इशारों इशारों में ' पैकेज ' की बातें सुनते , सब का गवाह भी बन रहा हूँ . ( छपवाने की दिखलाने की कीमत ,खुल्लम खुल्ला तय है ,यह कोई समाचार नहीं है ) इमानदारी की ' राजनीति ' का सहारा क्या हो फिर ? अनैतिक तरीके से तो ' नैतिक ' विजय पाने का प्रयास ही सब से बड़ी अनैतिकता है और ' भ्रष्टाचार ' का अंग बन जाने की विवशता . उसका यह उत्तर ,कम से कम मेरा तो नहीं हो सकता .अब तक तो मेरा राजनैतिक और सामाजिक कार्य भारत और अमेरिका में भी बेदाग़ ही मानता रहा हूँ प्रयास भी रहा है मन से . और किसी ने सवाल भी नहीं उठाये हैं ,सराहना तो दर्ज है . चिंतन ,कर्म ,मन और वाणी में समरूपता भी एक ही रही है . किसी भी कीमत पर मैं इस किस्म की राजनीति का हिस्सा नहीं बन सकता . तो मार्ग क्या है ?


मुंबई में 227 सीटों पर चुनाव होने हैं .हमारी संगठनात्मक क्षमता और सीमित संसाधन सब सीटों पर चुनाव लड़ने की नहीं है .साथ ही हमारी शर्तें भी कि आपराधिक रिकार्ड ,भ्रष्टाचार विमुक्त भूतकाल तथा धर्म ,जाति ,प्रान्त ,भाषा के आधार पर पूर्वाग्रह या विग्रह या नफ़रत की राजनीति ( खास कर राज ठाकरे की नफ़रत युक्त विभाजक राजनीति ) से मुक्त ,सामाजिक जीवन का आकलन तथा उम्मीदवार के किये गए सेवा कार्य या भविष्य में चुन लिए जाने पर जिम्मेदारी सँभाल पाने की योग्यता पूर्व निर्धारित हैं .जो उम्मीदवार इस कसौटी पर खरे नहीं उतर रहे ,उनके जीतने की संभावनाओं के बावजूद ,वे हमारे उम्मीदवार नहीं बन सकते .और जो कसौटी पर खरे उतरते हों तो भी उनके चुनावी खर्च में महत्वपूर्ण हिस्सा बन पाना हमारे संसाधनों में संभव नहीं है .अफ़सोस तो तब होता है कि जब कुछ ऐसे ' सही ' लोग भी सवाल करते हैं कि जब बिहार और झारखण्ड में हमारी सरकार है तो पार्टी खर्च क्यों नहीं कर सकती ? यानी उनके मन में भी यह बात होगी कि हम भी  सरकार बना भ्रष्ट तंत्र के हिस्से ही हैं . हो सकता है कि उनके सोचने का कुछ आधार भी हो पर पार्टी ने साफ़ जाहिर कर दिया है कि ' मुंबई ' को अपना चुनावी खर्च खुद देखना है ,पार्टी के पास कुछ नहीं है खर्च देने के लिए .


लेकिन शायद पार्टी की छवि कुछ अच्छी है . खास कर  बिहार में हमारी पार्टी के नितीश कुमार के मुख्य मंत्रित्व में हुए कार्य की राष्ट्रीय ,अंतरराष्ट्रीय सराहना तथा मुंबई में उत्तर भारतीयों की एक तिहाई के करीब वोट में हिस्सेदारी , जनलोकपाल पर पार्टी का स्टैंड वगैरह .मेरे स्वयं के भ्रष्टाचार के विरोध में अन्ना जी के संघर्ष की हिस्सेदारी भी .अन्य पार्टियों के टिकट न पा सकने  वाले ' विक्षुब्धों ' द्वारा हमारी पार्टी का टिकट पाने की संभावना की सून्घसांघ भी जारी है .उन्हें हमारा क्या उत्तर मिलता होगा आप अंदाजा लगा सकते हैं .( कई तो राजनीति के द्वारा इतनी कमाई किये हुए हैं कि इशारों में बता  देते  हैं कि टिकट के बदले   पार्टी की दरिद्रता  भी दूर  कर सकते हैं और मेरी  सेवाओं  का इनाम  भी मिल  सकता है ).
हँस  देने के अलावा  क्या कर सकता हूँ ?
फिर जब मिडिया का साथ न हो ,धन न हो ,संसाधन न हों तो लड़ें  कैसे ?


दिमाग  में सिर्फ पर्यायी ,अल्टरनेट मिडिया आता  है ,यानि  हम और आप जो इस से सहमत हों . नेट की ताकत को जो जानते हों .मैं सिर्फ अनुभव से इतना  ही जानता  हूँ कि उस वक्त का नया  मिडिया TV न होता तो केनेडी अमेरिका के राष्ट्रपति न बन पाते और नेट न होता तो ओबामा भी आज अमेरिका के राष्ट्रपति न बन पाते . मुंबई जैसे नगर में तो कम से कम नेट प्रभावी हो सकता है .कुल 227 जगहों पर या तो हमारे उम्मीदवार होंगे या हम आकलन कर हमारी कसौटी पर खरे उतरने वालों की उम्मेदवारी का समर्थन करेंगे .


मैं चाहूँगा कि इन्ही कसौटियों से बिना समझौता किये एक प्रयोग भी हो और उसकी ताकत भी पता चले .आपकी राय चाहूँगा और इस गणतंत्र दिवस पर इस देश के नागरिक होने के दायित्व के नाते , संभव हो ,और आप हमसे और हमारे उद्देशों से सहमत हों तो भी , या असहमत हों तो भी , अपनी सलाह और सहयोग जरूर दे सकते हैं और निवेदन है कि दें . 

अपने चुनावी अनुभव आप सब से मैं लगातार साझा भी करता रहूँगा .आशा है कि इस देश के जागरूक नागरिक के दायित्व के तहत आप सहयोग, सुझाव  ,आलोचना ,समालोचना सहित हर संभव सहायता  और मार्गदर्शन  भी करेंगे .यह प्रयोग चाहे  जिस  नियति पर पहुंचे  पर एक प्रयोग तो होगा ही ,जो आने वाले दिनों में नेट की उपयोगिता ,ताकत और चुनौती स्वीकार करने के साहस और विश्वास दोनों की परीक्षा भी होगी .
जय हिंद !   
            
 





शनिवार, 17 दिसम्बर 2011

गाँधी हत्या ,नाथूराम गोडसे और मेरी समझ .

17 दिसंबर 1949 को ,आज के ही दिन गाँधी जी की हत्या के अपराध में नाथूराम गोडसे को  फांसी दे दी गयी थी .आज गाँधी और गोडसे दोनों नहीं हैं .लेकिन दोनों अपने अपने विचारों में कम ज्यादा कईयों के मन में हैं और कर्म में भी .मराठी में ' मी नाथूराम गोडसे बोलतोय ' ( मैं नाथूराम गोडसे बोल रहा हूँ ) नाटक  बहुत चर्चित भी रहा है और दर्शकों ने उसे काफी देख सफल भी बनाया है , एक तरह से हिट   भी कह सकते हैं .आज भी हॉउसफुल भी होता रहता है .गाँधी पर तो  तमाम किताबें आयी हैं .

गाँधी की अपनी आत्मकथा सहित मैंने भी उन पर तमाम किताबें पढीं और फिल्मे  भी देखी हैं सम्पूर्ण  गाँधी वांग्मय  के बहुत सारे अंश भी पढ़े और कई उन पर लिखीं विश्वस्तरीय जीवनियाँ भी .लेकिन यह अकिंचन कोई विद्वता का दावा नहीं कर रहा सिर्फ अपनी ' समझ ' की बात कर रहा है क्योंकि ' मोहनदास ' एक करिश्मा कैसे बन गया सिर्फ ' गाँधी ' ही नहीं , इस देश भारत को भी जान पाने की महत्वपूर्ण कुंजी है .लेकिन  कुछ  साल  पहले  ( 2006 )  में आई उनके  पौत्र  राजमोहन  गाँधी  द्वारा  लिखी  ' MOHANDAS ' में  गाँधी जी  का  सर्वाधिक  विस्तार  है (पुस्तक  साईज  पेपर बैक में 750 पन्ने ) .राजमोहन जी का  बेबाक विवेचन और बहुत सारी बातें जो पहले की सामग्रयियों  में ( मेरी जानकारी में ) सामने नहीं आयी थीं और अधिकांशतः गांधीजी को ' महात्मा ' ही साबित करने का एक और प्रयास ही होती थीं ,यह किताब उस से बहुत अलग है . उन्होंने गांधीजी को महात्मा की बजाय  एक व्यक्ति , ' मोहनदास ' के रूप में ही दिखाया है .
लेकिन आज मेरे लिखने का आशय कुछ और है .फेसबुक पर गोडसे के कार्य को ' राष्ट्रधर्म '  मानने वाले कई लोगों ने आज के दिन उनके ' बलिदान और त्याग ' को गौरवान्वित करने की अपील की है .अहिंसा भारतीय सांस्कृतिक परंपरा का अविभाज्य अंग है .दया , ममता ,स्नेह ,प्रेम ,करुणा ,वात्सल्य , विश्वबंधुत्व  की ' वसुधैव कुटुम्बकम ' की अवधारणा का संपूरक  ! ' अहिंसा परमो धर्म ' हमें घुट्टी  में पिलाया जाता है .लेकिन इस ब्रम्ह वाक्य को अधूरता से कहा जाता है ........ सम्पूर्णता में इसी के साथ यह भी जुडा  है की ' हिंसा अपि न वर्जयेत रक्षानार्थे ' .आत्म रक्षा में हिंसा भी वर्जित नहीं है .गीता में स्वयं कृष्ण ने ही अर्जुन को युद्ध के लिए प्रेरित किया था ' न्यायार्थ ' . दशमेश गुरु गोविन्द सिंह जी ने भी न्याय की सब कोशिश असफल हो जाने पर हथियार उठाने को कहा था अन्याय के खिलाफ . मैं गाँधी के कर्म को भी युद्ध ही मानता हूँ . अहिंसक युद्ध . शायद उनके पास यही हथियार   था . चाहे उसे आप गांधीगिरी कहें या ' मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी ' .

लेकिन क्या गाँधी की हत्या और उसके कारण और कारक को अलंकृत किया जा सकता है ? कुछ अतीत में जाता हूँ .

करीब ३५ साल पहले ल'पीयरे और कोलिन्स की प्रसिद्द लेखक जोड़ी की एक किताब आयी थी , ' FREEDOM AT MIDNIGHT ' . उसमे कई व्यक्तियों के लिए तुच्छ लिखा गया था ,जिस में स्वातंत्र्य  वीर सावरकर भी थे  .गाँधी  पर तब  तक  जितना  बन पड़ा था पढ़ चुका था . साथ ही नाथूराम   गोडसे की सालों प्रतिबंधित रही  किताब ,जो उनके अदालत  में गाँधी हत्या के अभियोग  में उनका  ५४ पैरे का बयान था गाँधी हत्या का औचित्य सिद्ध करने का .नाम था ' MAY THIS PLEASE YOUR HONOR ' .नाथूराम ने अपनी पैरवी खुद की थी .उसी मुकदमे के सह अभियुक्त उनके छोटे भाई गोपाल गोडसे ने भी एक किताब लिखी थी मराठी में , ' गाँधी बध अणि मी ' ( गाँधी बध और मैं ) ,वह भी पढी थी .गाँधी हत्या के १० दिन पहले, २० जनवरी '४८ को ,उसी स्थल पर उनकी हत्या का पहला प्रयास हुआ था .जिसमे गोली गोपाल गोडसे को मारनी थी और उसके पहले अफरा  तफरी  फ़ैलाने के लिए २० साल के एक शरणार्थी युवक मदन लाल पाहवा को एक अहिंसक बोम्ब फेंकना था सभा में ,जो सिर्फ धमाका करता और धुआं फैला देता ,भगत सिंह के असेम्बली में फेंके बोम्ब की तरह बिना किसी को चोट पहुंचाए और उस मौके का फायदा उठा गोपल गोडसे पितौल से गाँधी जी पर गोलियां बरसाते . मदनलाल ने बोम्ब फेंका लेकिन जहां से गोपाल को गोली मारनी थी , वहां से गाँधी जी पर निशाना नहीं लग सका और उस दिन गांधीजी बच गए . मदनलाल को गिरफ्तार कर लिया गया और उस वक्त अपने जोश में वह बोल बैठा की " हम फिर आयेंगे ,गाँधी को छोड़ेंगे नहीं " .फिर षड्यंत्र का भेद जानने के लिए ३० जनवरी '४८ ,गांधी जी की हत्या होने तक , उसे हर तरह की यातना दी गयी १० दिन तक , सुराग जानने के लिए लेकिन वह कुछ नहीं बोला . आरोप लगाया गया की अगर पुलिस सुरक्षा का पक्का इंतजाम करती उसके बयान के अनुसार तो गाँधी को बचाया जा सकता था .

मदनलाल पाहवा दादर मुंबई के मेरे ही मोहल्ले में आजीवन कारावास से मुक्त हो , रद्दी का छोटा मोटा  धंधा  करते थे . मैंने कुछ और जानने के लिए उनसे संपर्क किया .उन्होंने बताया की लेखक द्वय ने उनका कई किश्तों में इंटरव्यू लिया था लेकिन किताब में उनके हवाले से सब कुछ उल्टा पुल्टा लिख डाला था ,गलत सलत . मैंने गोपाल गोडसे से मिलने की जिग्यांसा जताई जो पुणे में रहते थे अपनी सजा काट लेने के बाद .उन्होंने मान लिया .सावरकर जी के भतीजे ,जयंत सावरकर जी से भी बात हुयी . इन  सब ने गाँधी हत्या का औचित्य बताया और कोई पछतावा या मलाल भी नहीं था उन्हें  उसके लिए .औचित्य यह यह की गाँधी ने कहा था की " पाकिस्तान मेरी लाश पर बनेगा ,मेरे जीते जी नहीं " .पाकिस्तान बना और गाँधी की सहमती और सहयोग से बना और गाँधी तब भी जिन्दा थे .उन्होंने देश से विश्वास घात किया था  और उसका दंड उनकी लाश ही गिरना था .और भी की .....गाँधी की तुष्टिकरण की निति ने ही जिन्ना और मुसलमानों को वह ताकत दी वर्ना पाकिस्तान न बनता .यह भी की ........जो अपने सगे बच्चों के बाप होने का फ़र्ज़ न निभा सका वह ' राष्ट्रपिता ' कैसा और उसने अपने बच्चों की तरह ही देश का ' बापू ' बन देश से गद्दारी की .

मेरे यह पूछने पर की क्या RSS  का भी सहयोग या इक्षा थी , सभी ने एक तरह से संघ को गालियाँ ही दीं की ये तो हिजड़े हैं ,इनमे कहाँ हिम्मत थी .मेरे यह पूछने पर की कांग्रेस तो संघ का ही हाथ बताती है तो जबाब दिया की वह तो कांग्रेस की राजनीती है क्योंकि जनसंघ ( BJP तब जनसंघ थी ) को बदनाम कर फायदा उठाया जा सके .संघियों की गिरफ्तारी और प्रतिबन्ध को भी ( गाँधी हत्या के बाद ) उन्होंने राजनीती बताया .ये भी की हमने तो खुल कर बिना सजा के डर के साफ़ कहा की हमने किया लेकिन संघ तो बेक़सूर बताता रहा खुद को जो सच भी था और कुछ न करते हुए  माफी मांगने के लिए तक तैयार था जेल से छूटने के लिए और प्रतिबन्ध उठवाने के लिए . मैंने जिक्र किया की डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जो बाद में जनसंघ के स्थापक अध्यक्ष बने वे तो गाँधी हत्या के वक्त हिन्दू महासभा में थे और हिन्दू महासभा ने ही इसका समर्थन किया था और किताब में तो हिन्दू महासभा के सावरकर का हाँथ बताया गया है और उन पर भी गाँधी हत्या के लिए मुक़दमा चलाया गया था .स्वीकार किया गया की सावरकर जी का आशीर्वाद था ( तब तक उनकी मृत्यु हो चुकी थी ) लेकिन मुखर्जी वगैरह गाँधी की तरह ही अहिंसक राजनीती वाले थे ,इसीलिये हिन्दू महासभा से अलग हो बाद में जनसंघ बनाया .

मेरा अपना विचार मैंने रखा जो उनके किये गए पर प्रतिप्रश्न ही था .मैंने कहा की जब भगत सिंह ,सुखदेव और राजगुरु को फांसी की सजा सुनायी गयी तो पूरा देश उबल कर उठ खड़ा हुआ और गाँधी जी पर काफी दबाव भी बनाया गया की गाँधी -इरविन समझौता बैठक में गांधीजी वायसराय इरविन से फाँसी की सजा को माफ़ करने के लिए कहें .इरविन ने भी बयान दिया था की अगर गाँधी जी कहें तो फाँसी की बजाय सजा को आजीवन कारावास में बदले जा सकने पर विचार हो सकता है .यद्यपि       वह इरविन की चाल थी .समझौता तो हुआ और बहुत सारे मुद्दों पर , जो देश हित में थे और गाँधी की जीत  भी था वह , पर गाँधी ने उस बैठक में भगत ,सुखदेव ,राजगुरु को फाँसी न दिए जाने का सवाल ही नहीं उठाया .बाद में शहीदों  को फाँसी दिए जाने के परिणाम स्वरुप देश भर में गाँधी के खिलाफ हर जगह विरोध का माहौल बन गया और उनका देश में निकलना तक मुश्किल हो गया .कई जगह उनके घोषित कार्यक्रम में अनगिनत लोगों ने काले झंडे दिखाए और कई जगह घोषित कार्यक्रमों को रद्द भी कर दिया गया .अमृतसर में तो स्टेसन पर लाखों लोगों के काले झंडे से ' स्वागत ' करने की लाखों की भीड़ का समाचार जान ' निर्भीक ' गाँधी एक स्टेसन पहले ही ट्रेन से उतर गायब हो गए और अमृतसर प्रवेश भी नहीं किया .उसी तरह बंटवारे की विभीषिका को जान , देश भर में पाकिस्तान बनाये जाने के कारण गाँधी अपना कद काफी खो चुके थे और उनके खिलाफ विरोध काफी मुखर भी हो चुका था .
बाद में जब पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला कर दिया तो भारत द्वारा  उसको चुकाई  जाने वाली  ५५ करोड़  रुपयों  की किश्त  रोक दी गयी क्योंकि कंगाल पाकिस्तान उसी पैसे से लडाई के लिए हथियार खरीदता और जायज भी था वह निर्णय क्योंकि पाकिस्तान ने कश्मीर पर आक्रमण कर बंटवारे की शर्तों का उल्लंघन किया था . गांधीजी ने कहा  की यह वादा खिलाफी भारत की थी और भारत पैसे दे , पाकिस्तान उस पैसे का जो चाहे वो करे .पटेल सहित पूरा देश गांधीजी से सहमत नहीं था अतः निर्णय नहीं बदला गया .अपनी जिद में गांधीजी ने आमरण अनशन ठान लिया और उपवास पर बैठ गए . लेकिन इस बार देश गाँधी के विरोध में मुखर होने लगा क्योंकि मामला देश की सुरक्षा का था .जगह जगह प्रदर्सन होने लगे उनके विरोध में और जहां वह अनसन पर बैठे थे वहां एक भारी भीड़ ने तो नारे तक लगाये की ' मरता है तो मरने दो ' . 
गाँधी के जीते जी ही उस अहिसा के पुजारी के सब से बड़े शिष्य नेहरु ने उस अहिंसक विरोध को पुलिस के डंडे से दबाया .अंत में पटेल को मजबूर हो गाँधी की प्राण रक्षा के लिए पाकिस्तान को ५५ करोड़ रुपये देने पड़े लेकिन तब तक गाँधी का यश ,कीर्ति और कद काफी कम हो गया था देश की जनता की नजरों में .
मैंने उन लोगों से कहा की अगर आप ने गाँधी की हत्या न की होती तो शायद गाँधी ' महात्मा ' न रह पाते और शायद जीते जी ही ' राष्ट्रपिता ' से  ' राष्ट्रद्रोही ' साबित कर लेते खुद को .और उनकी हत्या के कारण जो बाद में पूरे देश क्या दुनिया भर में सहानुभूति का माहौल बना उसमे आप सब सिर्फ ' हत्यारे '  बन कर रह गए और इतिहास में घृणा के पात्र . बाद में कांग्रेस ने उनकी चिता की पूंजी से जो राजनीती की रोटी सेंकी और ' नेहरु-गाँधी वंशवाद ' की अपनी जड़ें जमा लीं वह भारत का ' महानतम अभिशाप ' बन गया .क्या उसके लिए आप जिम्मेदार  नहीं हैं ? जबाब कुछ नहीं मिला इसके सिवाय की उस समय हमें जो कर्तव्य लगा किया .लेकिन शायद उन लोगों को  अपनी मूर्खता पूर्ण ' राजनैतिक भूल ' पर पछतावा जरूर हुआ होगा ऐसा मैंने महसूस किया क्योंकि बहस वहीं रुक गयी .

ऐसी ही मूर्खता पूर्ण भूल इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी के भी हत्यारों से हुयी जिसने इस देश के महानतम ' अभिशाप ' को उन्हीं के खून से सींच कर इस वंशवादी ' विषबेल ' को भारत के इतिहास का सब से बड़ा  दुर्भाग्य  बना डाला . शायद ' रक्त  बीज ' की यही  परिभाषा होती है ,जो अपने ही खून से सींचा जाता है और बढ़ता जाता है .

आजकल  कपिल  सिब्बल  साइबर  आजादी  पर सवाल उठा रहे  हैं .नाथूराम  के अदालत में दिए बयान को भी पूरी  अदालती कार्यवाही सहित नेहरु ने प्रकाशित नहीं होने दिया जो जानने का देश को कानूनन अधिकार था .उस कार्यवाही को प्रेस को भी रिपोर्ट करने का हक़ न था .

पूरा ट्रायल ' इन कैमरा ' हुआ यानी बंद कमरे की अदालत थी और सिर्फ चुनिन्दा लोग ,जिनमे जिम्मेदारियों पर बैठे ऊँचे लोग ,विद्वान पत्रकार और लब्ध प्रतिष्ठ सामाजिक हस्तियाँ  थी .जस्टिस  खोसला  ,( जो गाँधी हत्या के उस मुकदमे के न्यायाधीश  थे ) ने  बाद में अपनी लिखी किताब में लिखा की  " जैसा सब का मानना था मैं भी यही मानता था की नाथूराम कोई पागल हत्यारा होगा . लेकिन जब उसने अपनी धीर गंभीर पर शांत अनुत्तेजित जबान से अपना ५४ पैरे का बयान पढना शुरू किया तो मैं विष्मय में डूब गया . उसके पास कोई बड़ी अकेडमिक डिग्री नहीं थी न ज्यादा पढ़ा लिखा था पर उसकी विद्वता साफ़ जाहिर हो रही थी और मुझे अचंभित कर रही थी . पूरा बयान पढ़ लेने के बाद उस अति विशिष्ठ लोगों में उसके प्रति आदरमय सहानुभूति साफ़ दिख रही थी .पूरी अदालत निस्तब्ध हो गयी थी . कुछ की आँखों में आंसू झलक रहे थे और वे उसे रुमाल से पोंछ रहे थे . मेरा विश्वास है की उन्हीं लोगों को जूरी बना दिया जाता और निर्णय देने को कहा जाता तो शायद सभी एकमत से उसे ' NOT GUILTY ' ( निर्दोष ) करार देते ". 
बाद में उस बयान को किताब की शक्ल दे प्रकाशित होने पर प्रतिबंधित कर दिया गया जो शायद तीस साल बाद उठाया गया . ये हमारी अभिव्यक्ति की आजादी की मिसाल है और इसीलिये कपिल का पैंतरा समझा जा सकता है . लोगों को जानने ही न दो और वही बता लगातार मूर्ख बनाते रहो जो सत्ता में लगातार बनाये रखे .ये अंग्रेजों के कानून हैं जो हमें आज भी गुलाम बनाये रखने के हथियार हैं .

मुझे यह कहने की जरूरत नहीं की मैं नाथूराम के कृत्य से  असहमत था , हूँ और रहूँगा भी . इसलिए नहीं की वह हिंसा या गुनाह था . बल्कि वह इस देश की अब तक की गयी महानतम ' भूल ' थी .यही बात मैं अपने शहीदों के बारे में कभी सोच भी नहीं सकता . उनकी शहादतें जैसा की भगत सिंह ने खुद ही कहा था लाला लाजपत राय के शब्दों को दुहराते हुए की " मरना तो सब को है एक दिन . लेकिन मेरी मौत की बोझ से एक दिन यह ब्रिटिश साम्राज्य चमारा कर टूट जायेगा ' .
और बड़ी विनम्रता से गाँधी के योगदान को बिना नकारे यह भी कहूँगा की ऐसे अनगिनत बलिदानों के बिना गाँधी के लिए आज़ादी ला पाना उतना ही दूर होता जितना दक्षिण अफ्रीका की उस ट्रेन से निकाल  कर फेंक दिए जाने के बाद चल देने वाली ट्रेन की मंजिल .आज सिर्फ एक ' थप्पड़ ' की हिंसा से देश की पूरी संसद ' एकजुट गिरोह ' नजर आने लगी है .अन्नाजी पर ' हिंसाचार ' फ़ैलाने के vaise ही आरोप लगाये जा रहे हैं jaise  angrej लगाया करते थे .और उस से भी ज्यादा मुझे यह खुशी है की अन्ना गाँधी जी के साथ ही ' शिवाजी ' की भी बात कर रहे हैं .

आज के दिन नाथूराम गोडसे के हर अपराध को माफ़ करता हूँ क्योंकि गाँधी की आज़ादी में उसे अपनी बात कहने की आज़ादी नहीं दी गयी जो एक जान से भी कई गुना ऊँचा हक़ होना चाहिए . कपिल सिब्बल जी ध्यान से सुन लें . इस आज़ादी को अब इस देश का शिक्षित नौजवान अपनी जान दे देगा पर गँवाएगा नहीं . वह भी ' भगत सिंह ' की बात कर रहा है और सही कर रहा है .   







































































++डालने से गाँधी मर गए या गोडसे को faan 

मंगलवार, 31 मई 2011

INDIA AGAINST CORRUPTION

I want to draw nations attention to the happenings of Ahemedabad on 26th May and JAN LOKPAL BILL meeting of yesterday, 30th May 2011.

Now it is time for all attached with IAC ,who toiled and worked so hard ,day and night relentlessly ,for the initially declared cause i.e. to curb ,check ,punish and eliminate corruption from our society ,to rethink .In the beginning it was single declared aim and objective and an understanding to unite therefor,and to remain focused and limited to corruption and remedies therefore only, irrespective of anyone's personal views ,agenda , social ,religious beliefs or for that matter whatsoever individual role one may have in general .

But even since and during organizational stage at various levels and various places using  IAC forum , some elements kept on advocating and covertly managing and canvassing, now seemingly with well planned methods and design , their own agenda, including that of their own self promotional techniques  and political social philosophies ,beliefs ,aims ,objectives and hidden agendas to grab the opportunity emerged due to nationwide anger against corruption. Carefully coordinators were planted in various cities to lead IAC, solely chosen by them and to fulfill their own agenda .Now it is surfacing that even funding was done by congresees for a reason. 

May I ask ,how come very many eminent persons from various walks of life ,who had assembled on 30th January ,2011 for this single cause ,aim and objective at Ramlila Maidan of Delhi and various parts of nation and world, are not together today ? Very many of them have openly expressed and warned that certain people as leaders of ' civil society ' have hijacked this peoples self generated and volunteered movement for their own hidden agenda ,and conspired as establishment agents to vent the national anger against corruption and to calm down masses enraged by the same .Even a very wide ( well known as sold and part of establishment ) media coverage for Jantar Mantar event of 5th April was managed by congress itself .( many including Anna Hajarejee were surprised that how come same media ,which blacked out 30th January's more than a lakh gathering with so many important personalities involved ,did cover Jantar Mantar with such utmost importance and coverage never witnessed in recent times  ) .That  now many of these leaders are working as governmental agents by using their derived new status and by misusing and abusing IAC forum to attack political/social adversaries of congress by a preplanned strategy .The rewards /awards they managed to achieve is now so obvious that even a blind can see .

Mr. Arvind Kejrival ,so called founder and proponent of this movement (who was advocating cause of Vinayak Sen from IAC forum at various places along with so called and self proclaimed ' SWAMEE ' Agnivesh ,who gave a LAL SALAM to Naxals ,in various meetings of IAC) may have managed Vinayak Sen in planning commission's health committee ,who is not only a declared sympathizer of Naxals but convicted for his complicity in crime by a constitutional court under law of the land ? Role of Bhooshans in support of traitors like Arundhatee Roy and likes of Gilanee ,who openly asserted that Kashmir was never a part of India, an act of treason against the nation ,is any secret ? 

All those who did sweat and blood for the cause must warn them and certain elements who constitute so called ' civil society 'and those who ,unfortunately , have become leaders and face of IAC ,to desist from anti national acts ,and stop acting as extra constitutional authority to hold ' Jan Sunwayees ' by well planned methods to divert peoples attention and thus help corrupts in establishment ,mostly congresswalas ,responsible and beneficiary from  most of the corruptions ,since Independence .These ' civil society leaders ' were supported by people and chosen for ' JAN LOKPAL BILL ' only and not for giving their own sermons and judgments misusing and abusing peoples trust , from IAC forum .Hence they must limit their role  for the given cause only and not indulge in activities ,any activities , bad and ugly enough to hurt peoples cause of ' JAN LOKPAL ' and trust of people in them for the same . 

Otherwise, they may be assured that the same people, will bring them down to dirt with contempt they deserve for cheating their trust .They must not try to cheat peoples faith and trust to help those who are real culprits and corrupts and disgrace to nation .They also must be assured that this NATION is not going to stop this ' War Against Corruption ', despite them, in spite of   them and probably without them, if the need be.

रविवार, 20 मार्च 2011

DANDI MARH-2 ...............From Gandhiji;s SABARMATEE ASHRAM TO DANDI . ...

DANDI MARH-2 ...............From Gandhiji;s SABARMATEE ASHRAM TO DANDI . Stared 81years after ......same date and time on foot prints of Bapoo jee .

Due to lack of net connectivity photos could not be posted earlier.Intreaction and dialogue  on route to villagers young Indians and fellwo Yatris will follow in details subsequently .Right now few photos only..................
One of the many meetings with young Indians and dialogues and discussions for ' JAN LOKPAL BILL ' and its possible use and  the purpose to curve , check punish and recover stolen money stashed in foreign banks after handing over ' present ' provisions and that of JAN LOKPAL BILL '.

Garlanding BAPOO before MARH  and Other photos.............Prayer at gandhi statue before start of March and Monumental pitures during MARCH .

Other pictures and detailed desrcriptions to follow .......much could not be loaded due to lack of net connectivity in Rural areas............but few more interacting with young Indians will be suject of next  posts.

बुधवार, 9 मार्च 2011

दांडी मार्च -2

१२ मार्च १९३० को महात्मा गाँधी जी ने ऐतिहासिक डांडी मार्च शुरू किया था ,साबरमती आश्रम से लेकर समुद्र तट पर स्थित डांडी तक . २४० मील की इस यात्रा में गांधी जी के साथ सिर्फ करीब सत्तर से कुछ ज्यादा ही लोग थे पर डांडी पहुँचते पहुँचते लाखों का सैलाब बन गया यह अभियान .काले नमक  कानून को तोड़ हजारों ने नमक बनाया और देश दुनियां भर में यह अभियान करोड़ों की प्रेरणा बन गया ,साम्राज्यवाद के खिलाफ .

आज भारत की जो दशा है और भ्रस्टाचार को जिस तरह संस्थागत स्वरुप मिल गया है वह गांधी जी का ' रामराज ' नहीं वरन देशद्रोही ,जनद्रोहियों का ' हराम राज ' बन गया है .देश स्तब्ध तो है पर किंकर्तव्य विमूढ़ नहीं .विभिन्न मंचों से प्रतिकार में विरोध विद्रोह बन कर उभरा है .ऐसा ही एक मंच है ' INDIA AGAINST CORRUPTION ' या  ' भ्रस्टाचार के विरुद्ध जनयुद्ध .इसमें देश की नामी गिरामी हस्तियाँ शामिल हैं जैसे की प्रख्यात समाज सेवी अन्ना हजारे ,बाबा रामदेव ,किरण बेदी ,प्रशांत भूषण ,स्वामी अग्निवेश ,अरविन्द केजरीवाल ,श्री श्री रविशंकर ,जस्टिस संतोष हेगड़े आदि तथा कितने ही ख्यातनाम नागरिक ,हिन्दू ,मुस्लिम ,सिख ईसाई का भेद मिटा कर ,एकजुट  हुए हैं .

इनमे शामिल प्रख्यात कानून विदों ने जिसमे पूर्व कानून मंत्री शांतिभूषण ,प्रशांत भूषण ,जस्टिस संतोष हेगड़े ने ' भ्रस्टाचार ' पर लगाम लगाने के लिए तथा शीघ्र सजा दिलाने के लिए ' जन लोकपाल बिल '  का प्रारूप तैयार किया है .यह तब किया गया जब सरकार द्वारा लाये जाने वाले ' लोकपाल ' की भनक मिली जिसके तहत जनता को बेवकूफ बनाने की एक तिकड़म से कि ' कुछ किया जा रहा है '  , एक ऐसा बिल लाने  की योजना थी कि वर्तमान व्यवस्था में भी जो खामियां थीं वे तो बरक़रार रहती हीं ऊपर से उसमे प्रतिरोपित कानूनी चक्रव्यूह में आज भी जो धीमी गति है वह और भी  धीमी हो जातीं और एक तरह से भ्रष्टाचार को अतिरिक्त सहारा मिलता और छूटने के मौके और बढ़ जाते .

इस मंच के अन्ना हजारे ने ५ अप्रेल को ' जन लोकपाल बिल ' पास कराने के लिए आमरण उपवास की घोषणा की .सरकार ने घबराकर बातचीत करने के लिए मंच के ८ सदस्यों को ७ मार्च को आमंत्रित किया .लेकिन मई के अंत तक कुछ न कर पाने की असमर्थता बताई क्योंकि सरकार ' व्यस्त ' है. जाहिर है कि कई राज्यों के चुनाओं में सरकार घबराई हुयी है और मामले को तब तक लटका कर ठंढा कर देने के मंसूबे संजो रही है .अन्ना हजारे जी ने अपने उपवास के फैसले पर अटल रहने का निर्णय लिया है तथा अपने फैसले को अटल बताया .यद्यपि मीडिया काफी चुप्पी साध हमेशा की तरह ही छिपाने में ही लगा है लेकिन संचार युग के नेट्वर्किंग हथियार के सहारे दुनिया भर के सजग भारतीयों को एक कर रहा है .

अमेरिका यूरोप सहित विश्व भर में और भारत में भी  भारतीय कई जगह डांडी मार्च-२ का आयोजन कर रहे हैं और हजारों की संख्या में खुद को शामिल कर रहे हैं .

यह मेरा सौभाग्य है कि साबरमती से दांडी तक महात्मा के ८१ साल पहले के  पद चिन्हों पर चलने के इरादे और इस संघर्ष का बिगुल बजाते  मैं भी दांडी -२ मार्च में शामिल हो रहा हूँ ' जन लोक पाल बिल ' लिए . डांडी मार्च-२ भी , ८१ साल बाद ,उसी वक्त ,१२ मार्च को शुरू होगा और जैसे जैसे जिस पथ पर गांधी जी चले थे वही पथ होगा वही विराम स्थल और वही मंजिल .

हम भी नमक बनायेंगे . और वह नमक  छोटी छोटी पुड़ीयों में देश के हर लोकसभा ,राज्यसभा ,विधानसभा के सदस्यों ,न्यायाधीशों ,नौकरशाहों राष्ट्रपति वगैरह के साथ ही तमाम बड़े पूंजीपतियों को भेजा जायेगा कि इसे जरूर खाएं और उस महात्मा के नाम और उसके नमक की कसम ले कहें कि देश से ' नमक हरामी ' नहीं करेंगे .

बापू के ' रामराज ' को आना ही होगा और हरामियों के ' हराम राज ' को जाना ही होगा !  

जय हिंद !    `           









बृहस्पतिवार, 24 फरवरी 2011

गद्दार सरकार का झूठा सरदार

एक खबर या बयान जो भी आप चाहें कह लें ,अख़बारों में आपने भी पढी होगी या धिन्धोराची टी वी चैनलों पर देखी होगी .

भ्रष्टाचार और घपलों घोटालों से घिरी यूपीए सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संसद को आश्वस्त किया है कि वे न सिर्फ अपनी सरकार को भ्रष्टाचार मुक्त करेंगे बल्कि सार्वजनिक जीवन में भी शुद्धता लाने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे. भ्रष्टाचार के आरोपों में जिसे भी दोषी पाया जाएगा उनको पूरा दण्ड दिया जाएगा.
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का यह आश्वासन इस स्वीकारोक्ति के साथ आया है कि टेलिकॉम और कॉमनवेल्थ खेल ऐसे दो क्षेत्र हैं जिनमें कुछ ऐसा हुआ है जो दुर्भाग्यपूर्ण है. सदन को आश्वस्त करते हुए मनमोहन ने कहा कि उनकी सरकार जांच एजंसियों के साथ पूरी तरह से सहयोग करेगी ताकि सत्य सुरक्षित रह सके और दोषियों को सजा मिल सके.
राष्ट्रपति के अभिभाषण पर लोकसभा में चली बहस का जवाब देते हुए मनमोहन सिंह ने यह भी आश्वासन दिया कि विदेशों में रखे काले धन को वापस लाने के लिए वे पूरी कोशिश करेंगे.  विपक्ष को आश्वासन दे दिया कि इस मसले पर हम और आप एक हैं. 

लेकिन अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री ने अपने उस बयान का उल्लेख आज नहीं किया जिसमें उन्होंने देशों के साथ हुई संधियों का हवाला देकर काले धन की वापसी को मुश्किल बताया था. आज तो वे विपक्ष के भी विपक्ष नजर आने लगे लेकिन क्योंकि सरकार में हैं इसलिए कुछ सेफगार्ड तो रखने ही पड़ते हैं. इसलिए साथ में यह भी जोड़ दिया कि मामला दो पांच साल पुराना नहीं है इसलिए वक्त लगेगा.
प्रेस से बात करते हुए उन्होंने भले ही बहुत शील संकोच में बातें जनता के सामने रखीं हों लेकिन संसद को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने परत दर परत, प्वाइंट दर प्वाइंट अपनी सफाई रखी और ज्यादा बड़ी लक्ष्मण रेखा खींचते हुए संसद को आश्वस्त किया कि सरकार ही नहीं वे तो सार्वजनिक जीवन में सुचिता लाने की कोशिश करेंगे. उनकी कोशिश रंग लाए तो भला जनता को क्या ऐतराज लेकिन ......................

गद्दार सरकार का यह झूठा और बेशर्म ' सरदार ' कोई नयी बात नहीं कर रहा .एक वक्त इसने नरसिम्हा राव सरकार से इस्तीफ़ा देते हुए कहा था की " सीज़र की पत्नी को भी संदेह के परे होना चाहिए ".उस वक्त सोनिया के इशारे पर नरसिम्हा राव को कमजोर करने के लिए इसके आदर्शवादी ' पैंतरे ' को मेरे सहित देश ने भी इसमें इमानदारी देखी थी और बाद में इसके प्रधान मंत्री बनने पर एक उम्मीद भी जगी थी .लेकिन .........
 

सौ दिनों में देश का विदेशों में जमा काला पैसा लाने की बात की थी इसने पिछले आम चुनाव में . डेढ़ साल हो गए क्या किया ? ऊपर से और घोटाले पे घोटाले .कई इसे व्यक्तिगत इमानदार कहते हैं .तब तो मूर्ख भी हुआ भ्रष्टाचारियों को बचा कर और अपनी ' इम्पोर्टेड रानी '  का सिर्फ एक चाकर बन कर ,जिसके इशारे और षड्यंत्र का यह मुखौटा भर है .या कुर्सी का ऐसा मोह की अपनी रानी के लिए सब गालियाँ बेशर्मी से खाने को तैयार . इसका अर्थशास्त्र विदेशी ताकतों की दलाली है .भारत के करोड़ों मेहनतकश घरों के चूल्हों को ठंढा करने की कीमत पर .ये जो भी वादे करे उसे न सिर्फ झूठ समझा जाये बल्कि उसका उल्टा करने का पक्का इरादा माना जाये .
कल लोकसभा की लाइव टेलीकास्ट में इसका और इसकी आका का बेशर्म चेहरा देखने लायक था .
 

डा.लोहिया और जय प्रकाश ने कहा था " जिंदा कौमे पांच साल इंतजार नहीं करतीं " . उठो मेरे देश और सत्ता से हटा इस गद्दार जनद्रोही ,देशद्रोही सरकार को जेल में ठूँस दो या सड़क पर नंगा कर घुमाओ .अब इन  ' गांधीयों ' से देश को बचने बचाने के लिए गाँव ,गली ,सड़कों पर उतरना होगा .मिस्र और ट्युनिसिया की तरह उठना होगा .अब एक नयी क्रांति के बिना देश का कुछ नहीं हो सकता .क्या देश की जनशक्ति,खास कर ' युवाशक्ति ' सुन रही है ?
मैं अच्छी तरह ' राजद्रोह ' की परिभाषा जानता हूँ जिसके लिए मुझे आजीवन कारावास तक मिल सकता है या फाँसी भी ,१९६२ में लार्ड मैकाले के बनाये ' भारतीय (?)दंड संहिता ' के तहत ,जो देश को गुलाम बनाये रखने के औजार की इजाद थी .बताता चलूँ की वही आज भी लागू है लेकिन उसमे ' राजद्रोह ' के लिए दंड है ' देश द्रोह ' के लिए नहीं .जो वकील हैं वे आपको ठीक से समझा देंगे . और मेरी देशभक्ति ' राजद्रोह ' हो और उस का वही दंड हो तो मैं उसके लिए तैयार हूँ और खुद ' इंडिया अगेंस्ट करप्सन 'के बैनर तले सड़क पर उतर चुका हूँ और वादा करता हूँ की मौजूद मिलूंगा . 
 

और मनमोहन तूने  भले ' वंश दानी गुरु दशमेश गोविन्द सिंह ' का चोला पहन रखा हो ,उनके वेश नाम और काम का कलंक है तू .सिंह तो नहीं ही है तू .
थू है तुझ पर !