दोस्तों और पाठकों से माफी मांगूंगा देरी के लिए भी और विषयांतर के लिए भी .
पिछली पोस्ट की टिप्पणी में बताया था की इस वक़्त न्यू योर्क में हूँ और वर्त्तमान मेयर ब्लूमबर्ग के खिलाफ लड़ रहे अश्वेत बिल थाम्पसन के चुनाव प्रचार टीम का हिस्सा बनने के लिए ही आया था .तो आज थोडा इस विषय पर कहने से खुद को रोक नहीं पा रहा .
धन बल के साथ ही साथ तिकड़म , फरेब , धूर्तता और गिरगिट की तरह रंग बदलने का मतलब राजनिति में क्या होता है , हम भारत वाशियों से ज्यादा कौन जानता है ? अगर किसी को गलतफहमी हो कि अमेरिका में ऐसा नहीं होता तो वह मन से निकाल दे . बराक ओबामा की जीत से अगर लगता हो कि अमेरिका नस्लभेद को पीछे छोड़ चुका है तो वह लोग भी अपनी धारणा बदल दें .
आश्चर्य तो यह है कि न्यू योर्क जैसे शहर में ,जहां यह माना जाता है कि यह शहर अमेरिका का सब से ज्यादा ' लिबरल ' हिस्सा है , रंगभेद और नस्लवाद की यह यह सच्चाई अमेरिका के बारे में आँख खोल देने वाली हकीकत है.
पहले बता दूं कि ये माईक ब्लूमबर्ग क्या हैं .जो लोग न जानते हों उनको बताता चलूँ कि खरबों की हैसियत रखने वाली ' ब्लूमबर्ग फाईनेंसियल सर्विसेस ' के ८५ % मालिक हैं ये और संसार के सब से ज्यादा खरबपतियों के शहर न्यू योर्क के ,सब से धनी इंसान हैं ,फोर्ब्स पत्रिका के हिसाब से , जो धन और धनपतियों का लेखा जोखा बताती रहती है.
वे सन २००० तक डेमोक्रेटिक पार्टी में थे .पर जब लगा कि २००१ के मेयर की उम्मीदवारी डेमोक्रेटिक पार्टी से नहीं जीत सकते तो रिपब्लिकन बन गए .आज वह खुद कों इन्दिपेन्देन्त घोषित कर रहें हैं. ९/११ के भय और सदमे के माहौल के बाद तत्कालीन रिपब्लिकन मेयर रूडी जुलियानी को मीडिया ने तथाकथित ' हीरो ' बना दिया , तो मौके का फायदा उठाने के लिए किसी तरह से ब्लूमबर्ग ने जुलियानी से दोस्ती पक्की कर ली गो कि पहले उनके तीसरे टर्म का मेयर बनने के प्रयासों का विरोध कर चुके थे . बाद में यह पोल भी खुल गयी कि जुलियानी कितने बड़े हीरो थे ,जब उन्होंने अमेरिकी प्रेसिडेंट के चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की दावेदारी को आजमाने की कोशिश की .साबित ये हुआ कि बुश की ही तरह जुलियानी के एक्शन भी सिर्फ दिखावा मात्र ही नहीं ,मूर्खताओं का दस्तावेज़ भी थे .भ्रष्टाचार और माफिया के उन्मूलन के लिए जाने गए और उसी पूंजी के बल पर राजनीती में ऊपर आये जुलियानी का बनाया हुआ पुलिस कमिश्नर रिश्वतखोरी और धोखाघड़ी के जुर्म में आज कल जेल काट रहा है .
पूरे अमेरिका के हीरो माने जा रहे जुलियानी के समर्थन और खुद के ४०० करोड़ के धन खर्च करने की हैसियत और छमता के बल ,कोई राजनैतिक अनुभव न रखने वाले ब्लूमबर्ग ने मीडिया सहित सभी प्रचार माध्यमों को बड़े बडे विज्ञापनों से खरीद लेने के बल पर ,न्यू योर्क के मेयर बन कर उभरे .ब्लूमबर्ग ने मुख्य मुद्दा न्यू योर्क शहर की सुरक्छा को बनाया . क्योंकि पूरा अमेरिका डरा हुआ था और न्यू योर्क ने तो उस हमले को सब से ज्यादा भोगा था ,जीतना उनके लिए केक वाक ही था . ( अमेरिका में चुनाओं में व्यक्तिगत या उगाही से प्राप्त धन खर्च की कोई सीमा नहीं तय है )
उनकी शुरुवाती छवि ऐसी बनी कि डरे हुए न्यू योर्क शहर ने उनमे एक तारणहार देखा. उन्होंने अपनी करोड़ों की तनख्वाह कों नकारते हुए सालाना सिर्फ एक डालर की तनख्वाह पर काम करने की घोषणा की. ( बाद में कई अर्थशास्त्रियों ने दस्तावेजी सबूतों सहित साबित किया कि उन्होंने चालाकी भरे निर्णयों से अपनी कंपनी ही नहीं अपने और कई मित्रों कों खरबों का फायदा कराया. हाँ लेकिन इतनी सफाई से कि कानूनी शिकंजे में न फंस सकें ) .
न्यू योर्क के तथाकथित नवनिर्माण के नाम पर गरीब इलाकों के मोहल्ले कौड़ियों के भाव अधिगृहित कर स्टेडियम तथा ऊंची ,मंहंगी अट्टालिकाओं के लिए अपने खासम खास लोगों कों उपकृत किया .वह भी ,तब भी ,जब कि तमाम पर्यावरण प्रेमियों और मकानों किरायों की बढ़ती अंधाधुंध कीमतों के खिलाफ उठ खड़े हुए सरोकारी संघटनों ने ,जो मध्यम और निम्न आय वर्ग के लिए वाजिब दाम और किराये पर निर्माण कार्य की मांग कर रहें थे ,के लगातार विरोध के बावजूद .
जिन्हें इस पर शक हो वे सर्च में जा 'mike bloombarg ' खंगाल सकते हैं .हाँ वहां उन्हें कुछ उनके द्वारा दिए गए कुछ ' दान ' भी दिख जायेंगे जो उनकी एक डालर की तनख्वाह वाली तिकड़म और प्रचार का ही हिस्सा लगेंगे.
( सच मुच सरोकारी दानदाताओं से तुलना करनी हो तो वारेन बफेट और बिल गेट के दान भी देख लेँ , कि उन्होंने अपनी संपत्ति का कितना बड़ा भाग दान में दिया .)
एक काम जो उन्होंने शिद्दत से किया ,जन कल्याणकारी ,वह धूम्रपान से मुक्ति के लिए .सभी होटलों ,रेस्तराओं ,आफिसों ,बारों आदि में धूम्रपान पर पाबंदी लगाई और आदत छुड़ाने के लिए मुफ्त सेवाएं घोषित कीं .हाँ गाँजे के बारे में वे अपने विचार नहीं प्रकट करते . एक बार जब एक पत्रकार ने साफ़ साफ़ पूँछ डाला कि आपने कभी गांजा पिया है या पीते हैं तो उन्होंने बात कों मजाक में उड़ाते हुए मुस्करा कर कहा था कि " YOU BET, I DO " . ( एक सर्वे के मुताबिक 90% अमरीकी कभी न कभी या अक्सर ही दम मार लेते हैं . वैसे गांजा गैरकानूनी ही नहीं वहां भी जुर्म है ,बशर्ते डाक्टर ने अनुमोदित किया हो :) )
दूसरी बार भी २००५ में वे कुछ इसी अंदाज़ में सफल हुए .
न्यू योर्क शहर के अधिनियमों के अनुसार मेयर बनने की टर्म लिमिट थी , यानी प्रेसिडेंट की ही तरह दो बार से ज्यादा कार्यकाल कोई नहीं कर सकता था . अपनी ख्याति के उच्चतम शिखर पर रहते हुए जुलियानी ने ही जब सिटी काउन्सिल में लिमिट हटाने का प्रयास किया था, ताकि तीसरी बार भी मेयर बन सकें तो इन्हीं ब्लूमबर्ग ने जोरदार विरोध भी किया था और पूरे मीडिया से भी विरोध ' मैनेज ' करवाया था ,क्योंकि उन्हें तब खुद ही मेयर बनना था .तब उन्होंने इस विषय पर पूछे जाने पर बयान दिया था कि कोई भी व्यक्ति ' अपरिहार्य ' नहीं होता .टर्म लिमिट बनी रहनी चाहिए .
बहरहाल जुलियानी की और उनकी सुलह हो गयी ,क्योंकि राजनैतिक सत्ता के गलियारों में कब हमबिस्तर हुआ जाये और कब तलाक ले लिया जाये , चलता ही रहता है. कारन यह था कि जुलियानी की अगली सीढी न्यू योर्क का गवर्नर बनना था या सीनेटर या और भी ऊँची महत्वाकांछा अमेरिका का प्रेसिडेंट . इस नस्लवादी व्यक्ति के लिए भी जरूरी था कि ब्लूमबर्ग से दोस्ती बरक़रार रखना .जुलियानी ने दोनों पदों के लिए प्रयास किया भी पर तब तक उनकी काठ की हांडी में बहुत से छेद भी उजागर हो गए थे .सफलता तो दूर प्राईमरी राउंड में ही बाहर हो गए .
जिस तरह से न्यू योर्क की डेमोक्रेटिक बहुमत की सिटी काउन्सिल में , मेयर की टर्म लिमिट बढाकर विधान में संशोधन करवाया गया , ताकि ब्लूमबर्ग तीसरी बार भी मेयर के चुनाव में खड़े हो सकें ,उस पर एक प्रसिद्द पत्रकार ने और तमाम सरोकरिओं ने साफ़ साफ़ कहा कि काउन्सिल का बहुमत खरीद कर ब्लूमबर्ग की जेब में पहुंचा दिया गया है.
आठ साल तक न्यू योर्क के चुने गए कम्प्त्रोलर रहें ,अश्वेत बिल थाम्पसन , मेयर पद के चुनाव में ब्लूमबर्ग के प्रतिद्वंदी थे. अपने कार्यकाल में नगर प्रशासन की लापरवाही , भ्रष्टाचार ,धांधली, अधिकारों के दुरुपयोग ,नियमों की अवहेलना कर ठेकों का आबंटन ,और ब्लूमबर्ग द्वारा किये जा रहें दोस्तों और सहयात्रियों पर जितना 'अनुग्रह ', हो रहा था ,बिल थाम्पसन ने उस सब का निर्भीकता और इमानदारी से लगातार भण्डा फोड़ किया था .एक साधारण अश्वेत परिवार से उठकर ,सिर्फ अपनी काबिलियत के बल पर यहाँ तक पहुंचे बिल थोम्प्सन अपने आप में नैतिकता की एक मशाल हैं .
पूरी मीडिया के धिण्ड्होरचियों ने ,जिसमे मानदंड माने जाने वाले ,न्यू योर्क टाईम्स जैसे अख़बार भी शामिल थे ,शायद 'जागरण ' वगैरह कों मात दे दी और ब्लूमबर्ग का अनुमोदन किया.चुनाव अनुमान कर्ताओं ने तो अनुमान बताया कि ब्लूमबर्ग २० % तक की बढ़त ले लेंगे और बिल बुरी तरह हारेंगे . हाँ बिल हारे और ब्लूमबर्ग फिर जीत गए . पर तमाम अनुमानों कों धता बताते हुए ,ब्लूमबर्ग के खुद के पांच सौ करोड़ ( अन्य सहयोगियों का ' सहयोग ' जिसमे नहीं शामिल है ) के मुकाबले नगण्य खर्चे में भी ,यह हार सिर्फ चार प्रतिशत से भी कम वोटों से हुयी.
बिल थोम्प्सन ने इसे अपनी नैतिक विजय कहा. लेकिन इस पराजय में और भी अन्तर्निहित सत्य हैं जो पीड़ा देने वाले हैं .बराक ओबामा ,जिनसे अमेरिका ही नहीं पूरी दुनिया एक उम्मीद लगाये बैठी है ,उनका आचरण स्तब्ध कर देने वाला रहा .बगल के ही न्यू जर्सी के गवर्नर पद के (श्वेत ) उम्मीदवार , कोर्जायिन के लिए ,दिन रात एक कर देने वाले बराक ओबामा ने प्रचार तो क्या बिल थोम्प्सन का नाम तक नहीं लिया .जबकि थोम्प्सन ने बराक के चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी .एक अनुमान यह भी लगाया जा रहा है कि बराक नहीं चाहते थे कि अमेरिकियों कों लगे कि वे ' अश्वेतवादी ' हैं ,क्योंकि उन्हें प्रेसिडेंट बने रहने का दूसरा मौका भी लेना है .बहुसंख्य श्वेत बहुमत की लालच में उन्होंने शायद एक नैतिक ,इमानदार व्यक्ति का बलिदान करना ज्यादा सुलभ समझा हो.और क्योंकि ब्लूमबर्ग का विरोध करने की कीमत पर भविष्य में जो नुकसान हो सकता था ,वह अपनी ही पार्टी और अपने ही वर्ण रंग और घोषित नीतियों के अनुयायी के बलिदान से बड़ा हो सकता हो.
इसी तरह न्यू योर्क के डेमोक्रेटों ( श्वेत ) का रवैय्या और चुनाव में अन्मयस्कता भी समझ से परे लगती है.अल शार्पटन जैसे अश्वेत नेता जो बिना बात के भी श्वेत अश्वेत के मुद्दे उठाते रहते हैं ,उनका योगदान नदारत ही दिखा.चुनाव के पत्तेर्न से झलका कि स्टेटन आईलैंड में तो ,जो श्वेतों का गढ़ है ,बिल के खिलाफ जम के मतदान हुआ पर अश्वेत इलाकों से वोटरों कों निकालने की कोशिश अश्वेतों ने भी कुछ खाश नहीं की .
लुब्बे लुबाब ये कि क्या पैसे में इतनी ताकत है कि सही नेत्रित्व की जीती हुयी लडाई कों नाकाम कर दे .
बिल थोम्प्सन से मेरा लगाव क्यूं और कैसे हुआ ,फिर बताऊँगा .
बुधवार, १८ नवम्बर २००९
रविवार, १ नवम्बर २००९
क्या मैं नेता हूँ ??
मेरी पिछली पोस्ट की टिप्पणी में श्री गिरिजेश राव जी ने पूछा था " आप नेता हैं ? "
जबाब देना मुश्किल है और मुश्किल नहीं भी है .
मुश्किल यह है कि किसी वक़्त सुभाष चन्द्र बोस 'नेताजी' कहलाते थे .आज नेता कहलाया जाना शायद एक गाली ही है. (मेरी नज़रों में भी ).कारण आज नेता के नाम पर जो छवि उभरती है वह है एक ऐसे इंसान की जिसके भीतर किसी नैतिकता की ,किसी इमानदारी की ,किसी चरित्र की ,किसी उद्देश की ,किसी विचार या विचार धारा की ,वैचारिक राजनैतिक निष्ठां की ,सज्जनता की ,जनसेवा की भावना की या प्रतिबद्धता की कोई गुंजाईश ही न हो .इसके उल्टे जिसे चोर ,फरेबी ,तिकड़मी ,भ्रष्टाचारी ,गुंडा ,बाहुबली ,कानून की धज्जियाँ उडाता हर अनैतिक काम करने में तत्पर और माहिर ,घमंड और दर्प में चूर (या अपने ऊपर वालों का चमचा ) समझा जाता हो. यही नहीं सत्ता ही का वह कामुक, जिसके लिए कोई भी मार्ग अपनाने कों तैयार हो.अक्सर सत्ता से धन उगाही और फिर धन से सत्ता (अक्सर गुंडागर्दी भी शामिल ) के त्रिकोण योग से राजनीती के पायदानों पर चढ़ता हुआ .क्या मुझे कुछ परिभाषित करने की जरूरत भी है ? यह तो जगजाहिर है .यही देश का दुर्भाग्य भी कि 'नेता ' का अर्थ और कर्म दोनों कितने बदल गए .छवि क्या से क्या हो गयी .
बड़ी विनम्रता से कहूँगा कि मैं खुद कों ऐसा नहीं मानता .जहां तक समझता हूँ मेरे दुश्मन (मैं अजातशत्रु होने का दावा नहीं करता ) भी मुझे ऐसा नहीं समझते .तो मैं स्वयं कों ' नेता ' तो नहीं ही मानता .मैं ' नेता ' नहीं हूँ .
हाँ ' मुंबई प्रदेश जनता दल यूनाईटेड ' का प्रेसिडेंट हूँ. अपने अमेरिका से पुनरागमन के बाद से .कैसे और क्यों यह जिम्मेदारी ली थोड़ी सी चर्चा कर दूं तो अगर किसी कों उत्कंठा हो तो निराकरण भी हो जाये.
पहले अपनी थोड़ी सी पृष्ठभूमि .अपने बारे में .
४६, में उत्तर प्रदेश के एक गाँव में जन्म.प्रारंभिक प्राईमरी की पढ़ाई पांचवीं तक ,गाँव से दो किलोमीटर दूर ,खुद की टाट पट्टी पर बिना ईमारत वाले स्कूल से की .१० साल की उम्र में मुंबई आया जहां पिता रेलवे में मुलाजिम थे .हिंदी म्युनिसिपल स्कूल से सातवीं फिर वहीं से दूसरे हिन्दी स्कूल से मट्रिक .तत्पश्चात कुछ कालेज की पढ़ाई मुंबई में और बाद में इलाहबाद विश्व विद्यालय से विज्ञानं और बाद में नेसनल इन्स्तित्यूत आफ टेक्नालोजी ,जमशेदपुर से इलेक्ट्रिकल इंजीनीयरिंग में स्नातक.फिर कुछसाल मुंबई में ही भारत सरकार की सेवा में. तबादले पर तबादले क्योंकि सिस्टम में अनफिट रहा. ऊपर वाले भी नाखुस नीचेवाले भी .क्योंकि संत तो नहीं कह सकता खुद कों पर लेन देन के खेल में बाधा ही रहा .जानने वाले कट्टर इमानदारी कों मेरी अव्यवहारिक ही समझते रहें .हार कर और परेशां होकर ,पत्नी की सलाह पर अमेरिका कों पलायन ,जो शायद पहले ही कर सकता था .
वहां भी सामाजिक राजनैतिक गतिविधियों से जुडा रहा और अमेरीकी प्रशासन से भी ,रंगभेद सहित जनहित के मामलों में संघर्स रत रहा , जमीन से लेकर अदालत तक . कुछ लोग मुझे विजयी भी समझते रहें पर शायद वह मेरा संतोष और आनंद या कर्म ही रहा.हाँ संतोष यह था कि न्यूयार्क प्रशासन में कुछ तो बदलाव ला सका इन मामलों में.
समाजवादी आन्दोलन से जुडाव की कहानी भी शायद एक संजोग ही था और उसे मैं आज तक भी अपना भाग्य ही मानता रहा हूँ .शायद ५८ की बात है .मेरे एक पारिवारिक सदस्य , प्रोफेसर वासुदेव सिंह ,लोहियावादी समाजवादी थे.(बाद में कांग्रेसी बन यूपी विधान सभा के सभापति और मंत्री भी रहें ). मुंबई आते तो हमारे यहाँ ही रुकते थे.जबकि मेरे दादाजी परम कांग्रेसी गांधीवादी थे.अंत तक अपने चरखे से ही कते सूत के कपडे पहनते रहें. ४२ में जेल भी गए पर ' सेनानी ' बन पेंसन कों धिक्कारा भी .मैं भी नेहरू कों अपना चाचा(पूरे देश जैसा) ही समझता था .घर मुंबई के शिवाजी पार्क से लगा हुआ था तो दादाजी के साथ कांग्रेस की हर सभा में जाया करता था ,खास कर नेहरू कों देखने की इच्छा से .
तो उन समाजवादी 'चाचा' के साथ एक बार शिवाजी पार्क में डा. लोहिया जी की सभा में जाना हुआ .वे मंच पर लोहिया जी के साथ और मैं आगे सभा में कुछ बच्चों के बीच .बमुश्किल हजार लोग रहें होंगे.लोहिया जी नेहरू के ' समाजवाद ' पर भी बोले सिर्फ कुछ ही समझ में आया .
सभा समाप्त हुयी और फिर मैं चाचाजी के साथ हो गया .तब भी मंच पर ही लोहिया जी सहित अन्य लोग मौजूद गपसप कर रहें थे.मैं ग्यारह बारह साल का लड़का ,लोहिया जी की मुस्कान भरी आँखों ने देखा . चाचाजी ने बताया कि उनके साथ हूँ.लोहिया जी ने हंसते हुए पूछा " सभा में तो आये हो पर कुछ समझे भी ? " डर और संकोच उनकी मुस्कान और आत्मीयता से तब तक निकल चूका था . कहा कि " हाँ आपसे ये जाना कि नेहरू के समाजवाद में उनके नाती पोते देहरादून के मन्हंगे अंगरेजी स्कूल में पढ़ते हैं जहां पहले अंग्रेजों के बच्चे पढ़ते थे और गरीब भारत के बच्चे बिना इमारतों वाले टाट पर .मैं भी ऐसे ही पढ़ा हूँ."
लोहिया जी ने स्नेह से सर पर हाँथ फेरा और बाकी लोगों से कहा कि " लोग समझते हैं कि लोहिया पागल है जो नेहरू की मजबूत दीवार से सर फोड़ रहा है. जानता हूँ शायद अपनी जिन्दगी में यह दीवार न तोड़ पाऊँ पर एक दरार तो कर ही दूंगा ताकी अगली पीढी ,इस बच्चे जैसी ,इसे ढहा सके."
लोहियावादी समाजवादी बनने और फिर १३ साल की उम्र में ही रात रात भर ,जार्ज फर्नांडिस के पहले चुनाव (मुंबई म्यूनिसिपल कारपोरेसन के ) में पोस्टर लगाने की शुरुवात हो गयी .
यह वर्ष लोहिया जी की जन्म शताब्दी वर्ष है .
(शेष अगली किश्त में . आज की राजनीती के अनुभव और तब की राजनीती )
जबाब देना मुश्किल है और मुश्किल नहीं भी है .
मुश्किल यह है कि किसी वक़्त सुभाष चन्द्र बोस 'नेताजी' कहलाते थे .आज नेता कहलाया जाना शायद एक गाली ही है. (मेरी नज़रों में भी ).कारण आज नेता के नाम पर जो छवि उभरती है वह है एक ऐसे इंसान की जिसके भीतर किसी नैतिकता की ,किसी इमानदारी की ,किसी चरित्र की ,किसी उद्देश की ,किसी विचार या विचार धारा की ,वैचारिक राजनैतिक निष्ठां की ,सज्जनता की ,जनसेवा की भावना की या प्रतिबद्धता की कोई गुंजाईश ही न हो .इसके उल्टे जिसे चोर ,फरेबी ,तिकड़मी ,भ्रष्टाचारी ,गुंडा ,बाहुबली ,कानून की धज्जियाँ उडाता हर अनैतिक काम करने में तत्पर और माहिर ,घमंड और दर्प में चूर (या अपने ऊपर वालों का चमचा ) समझा जाता हो. यही नहीं सत्ता ही का वह कामुक, जिसके लिए कोई भी मार्ग अपनाने कों तैयार हो.अक्सर सत्ता से धन उगाही और फिर धन से सत्ता (अक्सर गुंडागर्दी भी शामिल ) के त्रिकोण योग से राजनीती के पायदानों पर चढ़ता हुआ .क्या मुझे कुछ परिभाषित करने की जरूरत भी है ? यह तो जगजाहिर है .यही देश का दुर्भाग्य भी कि 'नेता ' का अर्थ और कर्म दोनों कितने बदल गए .छवि क्या से क्या हो गयी .
बड़ी विनम्रता से कहूँगा कि मैं खुद कों ऐसा नहीं मानता .जहां तक समझता हूँ मेरे दुश्मन (मैं अजातशत्रु होने का दावा नहीं करता ) भी मुझे ऐसा नहीं समझते .तो मैं स्वयं कों ' नेता ' तो नहीं ही मानता .मैं ' नेता ' नहीं हूँ .
हाँ ' मुंबई प्रदेश जनता दल यूनाईटेड ' का प्रेसिडेंट हूँ. अपने अमेरिका से पुनरागमन के बाद से .कैसे और क्यों यह जिम्मेदारी ली थोड़ी सी चर्चा कर दूं तो अगर किसी कों उत्कंठा हो तो निराकरण भी हो जाये.
पहले अपनी थोड़ी सी पृष्ठभूमि .अपने बारे में .
४६, में उत्तर प्रदेश के एक गाँव में जन्म.प्रारंभिक प्राईमरी की पढ़ाई पांचवीं तक ,गाँव से दो किलोमीटर दूर ,खुद की टाट पट्टी पर बिना ईमारत वाले स्कूल से की .१० साल की उम्र में मुंबई आया जहां पिता रेलवे में मुलाजिम थे .हिंदी म्युनिसिपल स्कूल से सातवीं फिर वहीं से दूसरे हिन्दी स्कूल से मट्रिक .तत्पश्चात कुछ कालेज की पढ़ाई मुंबई में और बाद में इलाहबाद विश्व विद्यालय से विज्ञानं और बाद में नेसनल इन्स्तित्यूत आफ टेक्नालोजी ,जमशेदपुर से इलेक्ट्रिकल इंजीनीयरिंग में स्नातक.फिर कुछसाल मुंबई में ही भारत सरकार की सेवा में. तबादले पर तबादले क्योंकि सिस्टम में अनफिट रहा. ऊपर वाले भी नाखुस नीचेवाले भी .क्योंकि संत तो नहीं कह सकता खुद कों पर लेन देन के खेल में बाधा ही रहा .जानने वाले कट्टर इमानदारी कों मेरी अव्यवहारिक ही समझते रहें .हार कर और परेशां होकर ,पत्नी की सलाह पर अमेरिका कों पलायन ,जो शायद पहले ही कर सकता था .
वहां भी सामाजिक राजनैतिक गतिविधियों से जुडा रहा और अमेरीकी प्रशासन से भी ,रंगभेद सहित जनहित के मामलों में संघर्स रत रहा , जमीन से लेकर अदालत तक . कुछ लोग मुझे विजयी भी समझते रहें पर शायद वह मेरा संतोष और आनंद या कर्म ही रहा.हाँ संतोष यह था कि न्यूयार्क प्रशासन में कुछ तो बदलाव ला सका इन मामलों में.
समाजवादी आन्दोलन से जुडाव की कहानी भी शायद एक संजोग ही था और उसे मैं आज तक भी अपना भाग्य ही मानता रहा हूँ .शायद ५८ की बात है .मेरे एक पारिवारिक सदस्य , प्रोफेसर वासुदेव सिंह ,लोहियावादी समाजवादी थे.(बाद में कांग्रेसी बन यूपी विधान सभा के सभापति और मंत्री भी रहें ). मुंबई आते तो हमारे यहाँ ही रुकते थे.जबकि मेरे दादाजी परम कांग्रेसी गांधीवादी थे.अंत तक अपने चरखे से ही कते सूत के कपडे पहनते रहें. ४२ में जेल भी गए पर ' सेनानी ' बन पेंसन कों धिक्कारा भी .मैं भी नेहरू कों अपना चाचा(पूरे देश जैसा) ही समझता था .घर मुंबई के शिवाजी पार्क से लगा हुआ था तो दादाजी के साथ कांग्रेस की हर सभा में जाया करता था ,खास कर नेहरू कों देखने की इच्छा से .
तो उन समाजवादी 'चाचा' के साथ एक बार शिवाजी पार्क में डा. लोहिया जी की सभा में जाना हुआ .वे मंच पर लोहिया जी के साथ और मैं आगे सभा में कुछ बच्चों के बीच .बमुश्किल हजार लोग रहें होंगे.लोहिया जी नेहरू के ' समाजवाद ' पर भी बोले सिर्फ कुछ ही समझ में आया .
सभा समाप्त हुयी और फिर मैं चाचाजी के साथ हो गया .तब भी मंच पर ही लोहिया जी सहित अन्य लोग मौजूद गपसप कर रहें थे.मैं ग्यारह बारह साल का लड़का ,लोहिया जी की मुस्कान भरी आँखों ने देखा . चाचाजी ने बताया कि उनके साथ हूँ.लोहिया जी ने हंसते हुए पूछा " सभा में तो आये हो पर कुछ समझे भी ? " डर और संकोच उनकी मुस्कान और आत्मीयता से तब तक निकल चूका था . कहा कि " हाँ आपसे ये जाना कि नेहरू के समाजवाद में उनके नाती पोते देहरादून के मन्हंगे अंगरेजी स्कूल में पढ़ते हैं जहां पहले अंग्रेजों के बच्चे पढ़ते थे और गरीब भारत के बच्चे बिना इमारतों वाले टाट पर .मैं भी ऐसे ही पढ़ा हूँ."
लोहिया जी ने स्नेह से सर पर हाँथ फेरा और बाकी लोगों से कहा कि " लोग समझते हैं कि लोहिया पागल है जो नेहरू की मजबूत दीवार से सर फोड़ रहा है. जानता हूँ शायद अपनी जिन्दगी में यह दीवार न तोड़ पाऊँ पर एक दरार तो कर ही दूंगा ताकी अगली पीढी ,इस बच्चे जैसी ,इसे ढहा सके."
लोहियावादी समाजवादी बनने और फिर १३ साल की उम्र में ही रात रात भर ,जार्ज फर्नांडिस के पहले चुनाव (मुंबई म्यूनिसिपल कारपोरेसन के ) में पोस्टर लगाने की शुरुवात हो गयी .
यह वर्ष लोहिया जी की जन्म शताब्दी वर्ष है .
(शेष अगली किश्त में . आज की राजनीती के अनुभव और तब की राजनीती )
मंगलवार, ६ अक्तूबर २००९
मित्रों माफी
अरसा हो गया आपके बीच आए .और आपको पाए .मन लगा रहता था पर कुछ जिम्मेदारियों आ गयीं, कुछ मैंने ले लीं।
जुलाई के पहले हफ्ते न्यूयार्क से वापसी पर हमेशा की तरह सीधे गाँव पहुँचा माँ के पास .सोचा था की दो दिन साथ बिता फ़िर मुंबई जाऊंगा.पर पाया की माँ ओस्टोपोरासिस से जूझ रही थी । ९७, में पिताजी की मृत्यु के बाद पुरखों की डेहरी से न टलने की कसम खाए और संतुष्टि से पूर्ण माँ इलाज़ के लिए भी कहीं जाने को तैयार नाहीं.कहती रही " सौ साल जी लिए अब कहे जिलाए जाओगे ? (वैसे वह सिर्फ़ ८८ की ही हैं ।) बहुत जी लिए है.( पर तीन हफ्ते लग गए और धमकी काम कर गयी की फ़िर मैं भी कहीं नाहीं जाऊंगा ) मुंबई लाया । जनरल स्क्रीनिंग पर कुछ जरूरी और गंभीर मामले निकले .कुछ ऑपरेशन और अस्पताल अब स्वस्थ हैं।
फ़िल्म निर्माण का काम तो चल ही रहा है । साथ ही मुंबई प्रदेश जनता दल (यूनायितेद ) का अध्यक्क्ष तथामहाराष्ट्र चुनाव का प्रभारी होने का मतलब चुनाव तथा राजनीती के जानकर ही लगा सकते हैं.दिन रात एक हो जातेहैं। हो रहे हैं। उस विषय व राजनीती की विभत्सता पर फ़िर कभी ।
फिलहाल बहुत परम स्नेह भरे बड़े सारे प्रिय ब्लोगरों के मेल मिले । लम्बी अनुपस्थिति पर उलाहने भी । सब कानाम नहीं लूँगा बस इस डर से की किसी प्रिय का नाम न छूट जाए। बस थोड़ी मोहलत और फ़िर अपने ब्लॉगपरिवार में ही तो मन रमेगा। आप सभी को ईद , दशहरे और दीवाली की शुभकामनायें।
सभी मित्रों व हिन्दी ब्लॉग परिवार को मेरा प्रेम स्नेह और आदर । जल्दी ही वापसी होगी आपके बीच ।
राज सिंह .
जुलाई के पहले हफ्ते न्यूयार्क से वापसी पर हमेशा की तरह सीधे गाँव पहुँचा माँ के पास .सोचा था की दो दिन साथ बिता फ़िर मुंबई जाऊंगा.पर पाया की माँ ओस्टोपोरासिस से जूझ रही थी । ९७, में पिताजी की मृत्यु के बाद पुरखों की डेहरी से न टलने की कसम खाए और संतुष्टि से पूर्ण माँ इलाज़ के लिए भी कहीं जाने को तैयार नाहीं.कहती रही " सौ साल जी लिए अब कहे जिलाए जाओगे ? (वैसे वह सिर्फ़ ८८ की ही हैं ।) बहुत जी लिए है.( पर तीन हफ्ते लग गए और धमकी काम कर गयी की फ़िर मैं भी कहीं नाहीं जाऊंगा ) मुंबई लाया । जनरल स्क्रीनिंग पर कुछ जरूरी और गंभीर मामले निकले .कुछ ऑपरेशन और अस्पताल अब स्वस्थ हैं।
फ़िल्म निर्माण का काम तो चल ही रहा है । साथ ही मुंबई प्रदेश जनता दल (यूनायितेद ) का अध्यक्क्ष तथामहाराष्ट्र चुनाव का प्रभारी होने का मतलब चुनाव तथा राजनीती के जानकर ही लगा सकते हैं.दिन रात एक हो जातेहैं। हो रहे हैं। उस विषय व राजनीती की विभत्सता पर फ़िर कभी ।
फिलहाल बहुत परम स्नेह भरे बड़े सारे प्रिय ब्लोगरों के मेल मिले । लम्बी अनुपस्थिति पर उलाहने भी । सब कानाम नहीं लूँगा बस इस डर से की किसी प्रिय का नाम न छूट जाए। बस थोड़ी मोहलत और फ़िर अपने ब्लॉगपरिवार में ही तो मन रमेगा। आप सभी को ईद , दशहरे और दीवाली की शुभकामनायें।
सभी मित्रों व हिन्दी ब्लॉग परिवार को मेरा प्रेम स्नेह और आदर । जल्दी ही वापसी होगी आपके बीच ।
राज सिंह .
मंगलवार, १६ जून २००९
निठल्ले , सठेल्ले और ............ठल्ले :)
आजकल पिछले कुछ दिनों से गंभीर चल रहा था । वह भी अगंभीर कारणों से , आदतसे मजबूर । सिर्फ़ गहन चिंतन मनन विश्लेषण में मशगूल । ज्ञान के लेवल पर ज्ञान दत्त जी से भी ऊपर और विज्ञानं के लेवल पर साइंस ब्लोगेरों के बराबर पहुँच गया । कानून के लिए ' तीसरा खम्भा ' तक नोंच डाला । गो की खिसियाई बिल्ली भी नही था । जानना चाहा था की पिछले २५ सालों में अगर न बदला हो तो कानून क्या है । कुछ खास पल्ले आजतक किसी के कुछ पड़ा है जो मेरे पड़ता । हाँ अंदाजा लगा की वर्णित , श्रवानित , निर्णीत , आरोपित , प्रतिअरोपित , प्रायोजित नौटंकी सहित सब कानून अलग अलग होते हैं । बन्दे बन्दे समझ भिन्न: , भाग्य भिन्न :, भोग भिन्न :, सम भोग भिन्न : । स्वाद भिन्न : । जेबनुसार जुगादानुसार न्याय भिन्न ;और काल्पनिक भी ।
मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया तो पाया की खतरे बढ़ते जा रहे हैं । संभावना है की कहीं स्वर्गीय शरद जोशी के अध्यक्छ महोदय की तरह गंभीर होते होते मनहूस न हो जाऊं । वैसे ही अकारण , मेरे हास परिहास का ' दोगला मुखौटा ' ओढे रहने के बावजूद , यार लोग मनहूस ही मानते रहे हैं । अब कोई सिद्धांत फिद्धांत को कब तक झेलता रहे । मैं चिंतित भी नहीं था । डरा था । साहस बटोरने के लिए ' भारतीय भुजंग ' तक हो आए । पता चला की वह तो सच मुच के साँपों के बारे में है। हम दोपायों के बारे में नहीं । डर भी हमारे जैसे मूर्खों के लिए भी , हाई विसिबिलिती होते हुए भी लो इंटेंसिटी वाला ही था ।। इस चिंतन प्रक्रिया से गुजर थोड़ा चैतन्य हुए ।
गंदी आदत रही है हमारी । लम्बी भूमिका बांधते जाने की । छमा करें मुद्दे पर आता हूँ ।
' निठल्ले ' के क्या मतलब हैं नहीं जानता । मैं सिर्फ़ उसे जीता हूँ । छठी संज्ञा से जान भी लेता हूँ पहचान भी लेता हूँ की और कौन कौन है । मतलब के लिए अमरजी या वडनेरकर जी ही उपयुक्त होंगे । उनसे मिलें ।
' सठेल्ले ' का मतलब उम्र साठ पार पहुँचा , निठल्लों के साथ ( या जो भी हत्थे लग जाए ) संग साथ संवाद और अड्डेबाजी और अबौद्धिक जुगाली का अभिलाषी , ठेल्लों के द्वारा ठेलित या उन्हें ही ठेल चुका , झेल चुका , परिभाषित नहीं कर पा रहा , पर यह सब भी हूँ । और क्या मतलब हो सकते हैं या लगाये जा सकते हैं विद्वानों के लिए छोड़ दे रहा हूँ । वैसे बाली उमरिया की तरह कुछ कुछ अपरिभासित ही रहे तो भोगने की ( अवसर और अवसरवादिता अनुसार ) सीमायें फैलाई भी जा सकती है । तो मैं भी हूँ सठेल्ला !
मेरा चिंतन और चिंता सिर्फ़ ' ठ्ल्लों ' को लेकर है । पहले तो गब्बर सिंह वाले अंदाज़ में कहना चाहता था अपना बयान " हमें सब कुछ मालूम है ........इसका मतलब " । लेकिन सच तो ये है की कन्फ्यूज हूँ । हाँ कुछ कुछ अनुमान है । मेरी इक्छा भले हो , छवि नहीं बन पाती की पहुँचा हुआ विद्वान लगूं और बिना समझे ही/भी मीमांसा कर डालूँ फ़िर कन्फ्यूज होने की जिम्मेदारी दूसरों की बने । तो मेरी सज्जनता भी है और मजबूरी भी अज्ञान भी । मतलब बताएं आप ही या फ़िर यथोचित समझ ही लें । अब पता नहीं किस विद्वान ने कितने सौ साल पहले कह दिया था की संवाद की और अभिव्यक्ति की तार्किकता के लिए जरूरी है की उपयोग में लाये जाने वाले शब्दों की परिभाषा तय कर ली जाए । मैं भी उसी से चिपका पड़ा हूँ । तय हो जाए ताकि आगे जो कुछ कहूं वह निर्विवाद हो न हो पर बचाव की ताकत भोपाल के मुख्य चौराहे पर लगी नेहरू जी की मूरत से कम न हो । ( अगर कोई भोपाली उसका फोटो यहाँ टिप्पणी में चिपका दे तो आभार मानूंगा )
तब तक के लिए मोहलत दीजिये ( अगली खेप तक ) मैं भी मतलब खोजने जा रहा हूँ , क्योंकि बात तो गंभीर करनी है न :).
हाँ ' राम की व्यक्ति परीक्स्छा ' की अगली कड़ी का वादा किया था लेकिन यहाँ माहौल ख़राब पा रहा हूँ । प्रयत्न कर रहा हूँ की आगे की कडियाँ किसी नारी विमर्श के ब्लॉग पर दूँ , या जो भी इसे वर्तमान युग सन्दर्भ में आवश्यक समझे और उद्देस का आदर करता हो मेरी ही तरह और प्रासंगिक भी , वहाँ दूँ । यहाँ माहौल ख़राब पा रहा हूँ । उद्देस और विषय भी व्यक्ति और व्यक्तिगतता से परे रहे तो अच्छा है . या आप भी राय दें .
पुनश्च :
ये आलेख ' निठल्ला श्रेष्ठ ' Dr. अमर कुमार जी और ' शब्द वेधी ' अजित वडनेरकर जी को समर्पित ।
मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया तो पाया की खतरे बढ़ते जा रहे हैं । संभावना है की कहीं स्वर्गीय शरद जोशी के अध्यक्छ महोदय की तरह गंभीर होते होते मनहूस न हो जाऊं । वैसे ही अकारण , मेरे हास परिहास का ' दोगला मुखौटा ' ओढे रहने के बावजूद , यार लोग मनहूस ही मानते रहे हैं । अब कोई सिद्धांत फिद्धांत को कब तक झेलता रहे । मैं चिंतित भी नहीं था । डरा था । साहस बटोरने के लिए ' भारतीय भुजंग ' तक हो आए । पता चला की वह तो सच मुच के साँपों के बारे में है। हम दोपायों के बारे में नहीं । डर भी हमारे जैसे मूर्खों के लिए भी , हाई विसिबिलिती होते हुए भी लो इंटेंसिटी वाला ही था ।। इस चिंतन प्रक्रिया से गुजर थोड़ा चैतन्य हुए ।
गंदी आदत रही है हमारी । लम्बी भूमिका बांधते जाने की । छमा करें मुद्दे पर आता हूँ ।
' निठल्ले ' के क्या मतलब हैं नहीं जानता । मैं सिर्फ़ उसे जीता हूँ । छठी संज्ञा से जान भी लेता हूँ पहचान भी लेता हूँ की और कौन कौन है । मतलब के लिए अमरजी या वडनेरकर जी ही उपयुक्त होंगे । उनसे मिलें ।
' सठेल्ले ' का मतलब उम्र साठ पार पहुँचा , निठल्लों के साथ ( या जो भी हत्थे लग जाए ) संग साथ संवाद और अड्डेबाजी और अबौद्धिक जुगाली का अभिलाषी , ठेल्लों के द्वारा ठेलित या उन्हें ही ठेल चुका , झेल चुका , परिभाषित नहीं कर पा रहा , पर यह सब भी हूँ । और क्या मतलब हो सकते हैं या लगाये जा सकते हैं विद्वानों के लिए छोड़ दे रहा हूँ । वैसे बाली उमरिया की तरह कुछ कुछ अपरिभासित ही रहे तो भोगने की ( अवसर और अवसरवादिता अनुसार ) सीमायें फैलाई भी जा सकती है । तो मैं भी हूँ सठेल्ला !
मेरा चिंतन और चिंता सिर्फ़ ' ठ्ल्लों ' को लेकर है । पहले तो गब्बर सिंह वाले अंदाज़ में कहना चाहता था अपना बयान " हमें सब कुछ मालूम है ........इसका मतलब " । लेकिन सच तो ये है की कन्फ्यूज हूँ । हाँ कुछ कुछ अनुमान है । मेरी इक्छा भले हो , छवि नहीं बन पाती की पहुँचा हुआ विद्वान लगूं और बिना समझे ही/भी मीमांसा कर डालूँ फ़िर कन्फ्यूज होने की जिम्मेदारी दूसरों की बने । तो मेरी सज्जनता भी है और मजबूरी भी अज्ञान भी । मतलब बताएं आप ही या फ़िर यथोचित समझ ही लें । अब पता नहीं किस विद्वान ने कितने सौ साल पहले कह दिया था की संवाद की और अभिव्यक्ति की तार्किकता के लिए जरूरी है की उपयोग में लाये जाने वाले शब्दों की परिभाषा तय कर ली जाए । मैं भी उसी से चिपका पड़ा हूँ । तय हो जाए ताकि आगे जो कुछ कहूं वह निर्विवाद हो न हो पर बचाव की ताकत भोपाल के मुख्य चौराहे पर लगी नेहरू जी की मूरत से कम न हो । ( अगर कोई भोपाली उसका फोटो यहाँ टिप्पणी में चिपका दे तो आभार मानूंगा )
तब तक के लिए मोहलत दीजिये ( अगली खेप तक ) मैं भी मतलब खोजने जा रहा हूँ , क्योंकि बात तो गंभीर करनी है न :).
हाँ ' राम की व्यक्ति परीक्स्छा ' की अगली कड़ी का वादा किया था लेकिन यहाँ माहौल ख़राब पा रहा हूँ । प्रयत्न कर रहा हूँ की आगे की कडियाँ किसी नारी विमर्श के ब्लॉग पर दूँ , या जो भी इसे वर्तमान युग सन्दर्भ में आवश्यक समझे और उद्देस का आदर करता हो मेरी ही तरह और प्रासंगिक भी , वहाँ दूँ । यहाँ माहौल ख़राब पा रहा हूँ । उद्देस और विषय भी व्यक्ति और व्यक्तिगतता से परे रहे तो अच्छा है . या आप भी राय दें .
पुनश्च :
ये आलेख ' निठल्ला श्रेष्ठ ' Dr. अमर कुमार जी और ' शब्द वेधी ' अजित वडनेरकर जी को समर्पित ।
गुरुवार, १६ अप्रैल २००९
राम की 'व्यक्तिपरिक्षा-2'
' पूर्व कथन '
'बाल्मीकि' के राम राम थे ,
तुलसी के भगवान राम थे ।
' कथा ' सुनायी बाल्मीकि ने 'राम' की ,
पर मात्र कथा थी ?
सीता की व्यथा थी !
संत थे , थे तटस्थ ,वे कवि थे ।
बस वही कहा ,जो घटा ,
घटा कर नहीं कहा ,
कविता थी !
तुलसी तो थे संत ,
राम 'आराध्य' थे ।
' धर्म ' निभाया ,
उनके प्रभु ' श्री राम ' थे ।
थी तुलसी की श्रद्धा ही जो ,
राम को भगवान बना दिया ।
ब्रम्हा ,विष्णु, महेश की मोहर लगा ,
उनका अन्याय भी ' लीला ' बता दिया ।
लेकिन क्या इसी बहाने ,
हर पुरूष को 'अग्नि परीक्क्ष' मान ,
हर सीता की ' अग्नि परीक्षा ' का अधिकार थमा दिया ?
पौरुष ,चरित्र ,शील हीन हो तो भी क्या ?
नारी प्रताड़ना को उसका जन्मसिद्ध अभिमान बना दिया !
उस दर्प , दंभ, ताकत के बल ,अन्याय का सामान बना दिया ।
हर सीता को बस राम का एक अहसान ,
और ख़ुद को भगवान बता दिया ?
सब लक्ष्मण रेखाएं खींच ,
सब संहिताएँ लिख ,
सब वर्जनाएं लाद ,
अपराध को भी 'त्याग' कह
सब कुछ नारी की 'मर्यादा' बना दिया ।
और ख़ुद बन बैठा ,
' मर्यादा पुरुषोत्तम ' !
रक्षा , सुरक्षा ,मान, गरिमा के बहाने ,
खींच डाली ,कैद करतीं ,सब लकीरें ,
और कहलाता रहा वो पुरूष उत्तम !
पर तुम्हारा दोष क्या तुलसी,
मिला था जो तुम्हें , तुमने बताया ।
तुमने तो राम के सीता प्रेम को भी गाया ।
सीता में समाहित उनका समस्त ,
और सीता को राम समाहिता बताया ।
हर पुरूष मन के चरम से क्या सभी कुछ
जान पाया, मान पाया , या जिया ,या कुछ जिलाया ?
वह नेह मिल जाए तो पर ,
औरत कभी सीता हुयी ,
सीता ही होगी ?
क्यूं हो सवाल जब सदियों तक,
सीतायें थीं ,
थे राम कभी , तो कभी नहीं ।
जो नहीं राम हैं ,
मिले भी वो तो, भला करे क्या नारी ?
क्या सब सह ले ,पर उठे नहीं ?
जाती भी रहे धिक्कारी ?
वो राम नहीं तो 'अग्नि परीक्षा ' कैसी वह ?
क्यूं नारी की ही ?
क्यूं दे ,क्यूं दे, क्यूं दे , वह ?
छोड़ो वह अग्निपरीक्षा भी ,
वह सब तो बाद की बारी है ।
क्यों भ्रूण में मारी जाती है ,
इसलिए की बस वह नारी है ?
माता कहते , करते.... जय हो !,
'जयकारे' सब पाखंड नहीं ?
जिस मुल्क में सीता गर्भ में ही ,
धरती में समो दी जाती हो !
जन्मे तो जिए हारी मारी ,
बेजन्मे मारी जाती हो ।
इसलिए की बस वह नारी है ?
इसलिए की बस वो नारी है !
इसलिए ही बस वो नारी हो ?............अगली कड़ी का शीर्षक !
( प्रार्थना है कि कोई भी सन्दर्भ 'ब्रम्ह ' राम और 'आदिशक्ति ' सीता न समझलें । मैं यह मानता हूँ मानवों की ईश्वरीय तुलना सम्भव ही नहीं )
'बाल्मीकि' के राम राम थे ,
तुलसी के भगवान राम थे ।
' कथा ' सुनायी बाल्मीकि ने 'राम' की ,
पर मात्र कथा थी ?
सीता की व्यथा थी !
संत थे , थे तटस्थ ,वे कवि थे ।
बस वही कहा ,जो घटा ,
घटा कर नहीं कहा ,
कविता थी !
तुलसी तो थे संत ,
राम 'आराध्य' थे ।
' धर्म ' निभाया ,
उनके प्रभु ' श्री राम ' थे ।
थी तुलसी की श्रद्धा ही जो ,
राम को भगवान बना दिया ।
ब्रम्हा ,विष्णु, महेश की मोहर लगा ,
उनका अन्याय भी ' लीला ' बता दिया ।
लेकिन क्या इसी बहाने ,
हर पुरूष को 'अग्नि परीक्क्ष' मान ,
हर सीता की ' अग्नि परीक्षा ' का अधिकार थमा दिया ?
पौरुष ,चरित्र ,शील हीन हो तो भी क्या ?
नारी प्रताड़ना को उसका जन्मसिद्ध अभिमान बना दिया !
उस दर्प , दंभ, ताकत के बल ,अन्याय का सामान बना दिया ।
हर सीता को बस राम का एक अहसान ,
और ख़ुद को भगवान बता दिया ?
सब लक्ष्मण रेखाएं खींच ,
सब संहिताएँ लिख ,
सब वर्जनाएं लाद ,
अपराध को भी 'त्याग' कह
सब कुछ नारी की 'मर्यादा' बना दिया ।
और ख़ुद बन बैठा ,
' मर्यादा पुरुषोत्तम ' !
रक्षा , सुरक्षा ,मान, गरिमा के बहाने ,
खींच डाली ,कैद करतीं ,सब लकीरें ,
और कहलाता रहा वो पुरूष उत्तम !
पर तुम्हारा दोष क्या तुलसी,
मिला था जो तुम्हें , तुमने बताया ।
तुमने तो राम के सीता प्रेम को भी गाया ।
सीता में समाहित उनका समस्त ,
और सीता को राम समाहिता बताया ।
हर पुरूष मन के चरम से क्या सभी कुछ
जान पाया, मान पाया , या जिया ,या कुछ जिलाया ?
वह नेह मिल जाए तो पर ,
औरत कभी सीता हुयी ,
सीता ही होगी ?
क्यूं हो सवाल जब सदियों तक,
सीतायें थीं ,
थे राम कभी , तो कभी नहीं ।
जो नहीं राम हैं ,
मिले भी वो तो, भला करे क्या नारी ?
क्या सब सह ले ,पर उठे नहीं ?
जाती भी रहे धिक्कारी ?
वो राम नहीं तो 'अग्नि परीक्षा ' कैसी वह ?
क्यूं नारी की ही ?
क्यूं दे ,क्यूं दे, क्यूं दे , वह ?
छोड़ो वह अग्निपरीक्षा भी ,
वह सब तो बाद की बारी है ।
क्यों भ्रूण में मारी जाती है ,
इसलिए की बस वह नारी है ?
माता कहते , करते.... जय हो !,
'जयकारे' सब पाखंड नहीं ?
जिस मुल्क में सीता गर्भ में ही ,
धरती में समो दी जाती हो !
जन्मे तो जिए हारी मारी ,
बेजन्मे मारी जाती हो ।
इसलिए की बस वह नारी है ?
इसलिए की बस वो नारी है !
इसलिए ही बस वो नारी हो ?............अगली कड़ी का शीर्षक !
( प्रार्थना है कि कोई भी सन्दर्भ 'ब्रम्ह ' राम और 'आदिशक्ति ' सीता न समझलें । मैं यह मानता हूँ मानवों की ईश्वरीय तुलना सम्भव ही नहीं )
गुरुवार, २ अप्रैल २००९
राम की ' व्यक्ति परीक्षा ' ?
आज राम नवमी के दिन
मैं हिंदू हूँ !
इसलिए मुझे हर एक आस्था और विस्वास का अधिकार है । और अपनी समझ में सत्य समझ कर उसे जीने का भी । जरूरत पड़े यदि ,तो अपनी इश्वर प्रदत्त बुद्धि और ज्ञान से उसे त्यागने और निंदा का भी अधिकार समझता हूँ । और करता भी हूँ । जरूरत पडी तो !
इसलिए यदि यह कहीं दुस्साहस लगे तो मुझसे कारण भी जानने का आपका अधिकार है ।
मैं समझता हूँ की करीब करीब सभी हिन्दुओं की आस्था और विश्वास का पहला पड़ाव 'राम' ही हैं। मेरे भी । मैं उनके और सीता के परस्पर प्रेम को समाज की मर्यादा के पालन का सर्वोत्तम पड़ाव मानता हूँ । उनका परस्पर अपनत्व सम्पूर्ण और अन्तर समाहित था । शायद उनके कष्ट बस एक दूसरे के कष्ट थे और आनंद एक दूसरे के आनंद । दोनों एक मिशन जी रहे थे ।
लेकिन आज के किसी भी इन्सान को आदर्शों की यह ऊँचाई बहूत छोटा बना सकती है । बना देती है । यहाँ तक की वर्जनाएं ही अशांत ज्यादा करने लगती हैं बनिश्पट ज़िंदगी । क्या हमें ये कहीं महसूस नहीं होता की राम और सीता और हमारे बीच उतनी ही दूरी है ,जितने हम में और इश्वर में । वो हम नहीं । हो भी नहीं सकते । बहुत ज्यादा कोशिश भी नहीं करनी चाहिए ।
मेरे लेखन में जो पौराणिक नाम आयेंगे उनका हेतु इतना ही है कि ,अपनी,आज के सन्दर्भ में, बात कह सकूं।समझा सकूं । यहाँ वर्णित 'राम' वे राम नहीं हैं, आज के हैं । फ़िर भी यदि कभी किसी को लगे की मैं उसकी आस्था पर प्रहार कर रहा हूँ तो इतना ही कहूँगा कि मैं भी अपनी आस्था पर उतना ही प्रहार कर रहा हूँ ।
हम हिंदू हैं ! क्या हम अपनी आस्था की परख भी नहीं कर सकते । इसे आप नारी विमर्श भी चाहे तो कह लें पर मैं इसे स्त्री पुरुस के संबंधों में परस्पर ' समता ,समानता और सन्मान ' को ही अन्तिम पड़ाव मानता हूँ। उसी को आदर्श भी । पर उसके लिए गहन परस्पर विस्वास भी जरूरी है । उसके लिए वक़्त आ गया है की चर्चा का पहला पड़ाव हमारी वर्जनाएं ही हों । उन पर संवाद तो न ही वर्जित हो ।
क्रमशः
------------------------------------------------
पुनश्च :आज ' राम नवमी ' पर हिन्दयुग्म पर मेरी एक संगीतमय संकल्पना 'नमामि रामम्' प्रकाशित हुयी है । आशा है सुन कर आप सब को ,आपको आनंद मिलेगा । कोशिस कर रहा हूँ की उसका लिंक दे दूँ ।
मैं हिंदू हूँ !
इसलिए मुझे हर एक आस्था और विस्वास का अधिकार है । और अपनी समझ में सत्य समझ कर उसे जीने का भी । जरूरत पड़े यदि ,तो अपनी इश्वर प्रदत्त बुद्धि और ज्ञान से उसे त्यागने और निंदा का भी अधिकार समझता हूँ । और करता भी हूँ । जरूरत पडी तो !
इसलिए यदि यह कहीं दुस्साहस लगे तो मुझसे कारण भी जानने का आपका अधिकार है ।
मैं समझता हूँ की करीब करीब सभी हिन्दुओं की आस्था और विश्वास का पहला पड़ाव 'राम' ही हैं। मेरे भी । मैं उनके और सीता के परस्पर प्रेम को समाज की मर्यादा के पालन का सर्वोत्तम पड़ाव मानता हूँ । उनका परस्पर अपनत्व सम्पूर्ण और अन्तर समाहित था । शायद उनके कष्ट बस एक दूसरे के कष्ट थे और आनंद एक दूसरे के आनंद । दोनों एक मिशन जी रहे थे ।
लेकिन आज के किसी भी इन्सान को आदर्शों की यह ऊँचाई बहूत छोटा बना सकती है । बना देती है । यहाँ तक की वर्जनाएं ही अशांत ज्यादा करने लगती हैं बनिश्पट ज़िंदगी । क्या हमें ये कहीं महसूस नहीं होता की राम और सीता और हमारे बीच उतनी ही दूरी है ,जितने हम में और इश्वर में । वो हम नहीं । हो भी नहीं सकते । बहुत ज्यादा कोशिश भी नहीं करनी चाहिए ।
मेरे लेखन में जो पौराणिक नाम आयेंगे उनका हेतु इतना ही है कि ,अपनी,आज के सन्दर्भ में, बात कह सकूं।समझा सकूं । यहाँ वर्णित 'राम' वे राम नहीं हैं, आज के हैं । फ़िर भी यदि कभी किसी को लगे की मैं उसकी आस्था पर प्रहार कर रहा हूँ तो इतना ही कहूँगा कि मैं भी अपनी आस्था पर उतना ही प्रहार कर रहा हूँ ।
हम हिंदू हैं ! क्या हम अपनी आस्था की परख भी नहीं कर सकते । इसे आप नारी विमर्श भी चाहे तो कह लें पर मैं इसे स्त्री पुरुस के संबंधों में परस्पर ' समता ,समानता और सन्मान ' को ही अन्तिम पड़ाव मानता हूँ। उसी को आदर्श भी । पर उसके लिए गहन परस्पर विस्वास भी जरूरी है । उसके लिए वक़्त आ गया है की चर्चा का पहला पड़ाव हमारी वर्जनाएं ही हों । उन पर संवाद तो न ही वर्जित हो ।
क्रमशः
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पुनश्च :आज ' राम नवमी ' पर हिन्दयुग्म पर मेरी एक संगीतमय संकल्पना 'नमामि रामम्' प्रकाशित हुयी है । आशा है सुन कर आप सब को ,आपको आनंद मिलेगा । कोशिस कर रहा हूँ की उसका लिंक दे दूँ ।
शनिवार, २८ मार्च २००९
सत्य !.............2
अपने इसी पोस्ट पे मैंने १२ मार्च को लिखा ' श्रीमती रिजवाना 'शमा' कश्यप अब तो सच बोलें '।
वह पोस्ट मैंने हटा दी है । कुछ और पोस्टें भी जो सम्बंधित थीं ,जिनमे गंभीर आरोप थे। 'शमा' पर एक अपराधिक षडयंत्र का आरोप। एक मानव जीवन को नष्ट करने के कारण बन जाने के 'अपराधिक षडयंत्र ' का आरोप । उनकी चारित्रिक त्रुटियों को इंगित करना मेरा मकसद न कभी रहा , न था ।स्वभावतः और अपने विश्वास के तहत , मैं बता दूँ की कभी किसी के चरित्र का मापदंड निर्धारण करना मैं अनुचित ही नहीं अनैतिक मानता हूँ और किसी नारी का तो कभी भी नहीं . मेरे पास किसी भी व्यक्ति का व्यक्तिगत सम्बन्ध और चरित्र मापने का कोई भी थर्मामीटर नहीं है न अपने बारे में ही किसी को यह हक देता हूँ ।
पिछले ५ महीनों से मैं उनके सानिध्य में आया । उनको जानने समझने का मौका मिला । उनसे आत्मीयता भी हुयी । उनसे प्रोफेसनली जुडाव भी हुआ । हमने एक डाकुमेंट्री फ़िल्म निर्माण की योजना भी बनाई । उसके आलेख लिखे गए और रूपरेखा बनाई गयी ।
ये बताना भी जरूरी समझता हूँ की अक्टूबर २००८ के पहले मैं न उनको जानता था न ही उनके परिवार और परिवेश से ही परिचित था । उनसे पहचान भी उनके ब्लॉग लेखन से ही हुयी , वह भी ये जानने के बाद की वह भी फ़िल्म निर्माण से जुडी हैं । हमारे ईमेल से संपर्क बने । मैं भी फ़िल्म निर्माण से जुड़ा हूँ और एक फ़िल्म का निर्माण निर्देशन भी कर रहा हूँ । महत्वपूर्ण था मेरे लिए मेरा अपना काम ही ।
न्यू यार्क से भारत आने के बाद उनसे मुलाकात हुयी और फ़िल्म निर्माण पर प्रोफेसनल चर्चा सत्र हुए । मैंने पाया की लेखन ,कास्तुम, कला और निर्मिती से सम्बंधित अन्य छेत्रों में उनका सहयोग और योगदान सहभागी हो सकते हैं । और उनके लघुचित्र निर्माण का अनुभव उपलब्धी एक अच्छे सहकारी सहायक की योग्यता रखते हैं ।
संयोग वश उन्हीं दिनों मुंबई के आतंकवादी हमले हुए । 'शमा' ने आतंकवाद ,आतंरिक पुलिस सुरक्छा और वर्तमान कानूनी प्रावधानों पर एक लघु चित्र की परिकल्पना की । विषय समयोचित और वर्तमान परिस्थितियों में बहुत महत्वपूर्ण था ।
मैंने निर्माण की जिम्मेदारी ली और विषय वस्तु तथा आलेख में उनकी सहायता का काम लिया । 'शमा' ने अपने ब्लॉग लेखन पर इसका उल्लेख भी किया और कई व्यक्तियों ने हमारी हौसला अफजाई भी की । हमने पूरी रूप रेखा बनाई और विभिन्न डिटेल्स भी पूरे किए । बाकी का काम उन्हें ही करना था क्योंकि सीमित समय में मुझे अपने मुख्य फ़िल्म का काम करना था । इस बीच उनके परिवार जनो से भी आत्मीयता हुयी । 'शमा' की कलात्मकता पर मैंने उसी बीच अपने ब्लॉग पे भी लिखा।
दुर्भाग्य ये रहा की उसी बीच 'शमा' बीमारी के चलते काम आगे न बढ़ा पायीं और मैं अपने कामों में मुम्बई में मशगूल रहा । इन कलात्मक कामों में समय सीमा निर्धारित करना बहुत मुश्किल होता है फ़िर भी एक वक़्त की एक डिसिप्लिन भी जरूरी होता है । उनके परिवार के सदस्यों ने भी महसूस किया की इन शारीरिक मानसिक हालातों में वे इस मेहनत के काम को नहीं अंजाम दे सकतीं ।शायद वे इरादतन नहीं चाहते थे की 'शमा' इस काम को करें . मैं भी उनके पारिवारिक कलह का हिस्सा नहीं बनना चाहता था ।
आकलन मेरा यह भी रहा की शायद इस वक़्त इन हालातों में यह काम रोक दूँ क्योंकि मेरी संलिप्तता के बिना 'शमा' इसे अंजाम नहीं दे सकतीं और मैं किसी भी हालत में ख़ुद अपने वक़्त देने में असमर्थ हूँ । मैंने 'शमा' को अवगत कराया की फिलहाल इसे करना सम्भव नहीं है ।
मेरा दुर्भाग्य की 'शमा' ने इसे हेठी समझा , अपना अपमान समझा , मेरी वादाफरामोशी माना और बिफर गयीं । सीधे अपनी पोस्ट पे जा , बिना नाम लिए लिखा अपनी पोस्ट 'अंतराल' । स्वर उसका यह था की मैंने काम का वादा कर उनसे मौका छीन लिया ।जबाब में मैंने उन्हें अनाम टिप्पणी दी की यह दुष्प्रचार न करें और लिखना ही है तो पूरी सच्चाई लिखें । जबाब में जो कुछ आया वह दुर्भाग्यपूर्ण था ,अवांछित भी । फ़िर हमने एक दूसरे पर आरोप लगते कई टिप्पणियां और पोस्टें लिखीं ।
लेकिन जो सबसे महत्वपूर्ण था वह साल भर पहले घटी वो घटना के बारे में था । 'शमा' ने उस घटना के बारे में अपनी पोस्ट 'दुविधा ' पर लिखा । मुझे जो जानकारियां मिलीं थीं वह सत्य उस घटना का 'सत्य' कुछ और बताती थीं । अतः मामले को गंभीर अपराध समझते मैंने अपनी पोस्ट पर लिखा । अपने विश्वास और पाई जानकारी के अनुसार वह अपराध पर परदा डालने का प्रयास था । मेरे लेखन में वही प्रकट भी हुआ ।
लेकिन सच्चाई क्या वही थी जो मैंने लिखी ? या भले वही होती तब भी क्या मुझे स्वयं यह पोलिसिंग करने का अधिकार मिल गया था ? क्या यह नैतिक था की किसी घटना पर अपने जाने सत्य और विश्वास पे , अपने प्रयासों से पाई सूचना (या किन्ही लोगों द्वारा दी गयी जानकारी ,शायद जानबूझकर ) को शायद पूरा सच मानते हुए सीधे ब्लॉग पर लिखता ? वह भी स्वयं जज ,जूरी और अभियोक्ता बन निर्णय सुनाता ? वह भी ,जहाँ अपराध की बात मान भी ली जाए तब भी, एक संभ्रांत नारी जो मित्र और सहायक भी रह चुकी थीं , उनके व्यक्तिगत जीवन को दर्शित कर एक तरह से नैतिक और चारित्रिक दोषारोपण करता ? (यद्यपि वह इरादा कभी नहीं था, तब भी, बात सिर्फ़ सामाजिक और कानूनी दायित्व की थी ,और यह बात मैंने बार बार कही भी ) । निश्चित रूप से ,नैतिक और कानूनी भी, सत्य का मेरा वह मेरा वह भ्रमित आत्मविश्वास और प्रतिक्रिया जल्दबाजी में की गयी नासमझी और उस नासमझी से उपजी असंस्कृत ,संस्कारहीन मूर्खता ही नहीं थी ? एक गैर जिम्मेदाराना काम नहीं था जिसके दूरगामी परिणाम हो सकते थे, शायद हुए भी ,और जिन्हें सुधार कर लौटाना सम्भव नहीं था ?
मुझ पर कोई दबाव नहीं पर मैं नयी परिस्थितियों में स्वयं को ही कठघरे में खड़ा पा रहा हूँ और अपने स्वयं के मानदंडों के हिसाब से ,अपने ही मानदंडों पर एक बहुत ही गैर जिम्मेदार इन्सान ही नहीं, एक नागरिक कर्तव्यों की अवहेलना करने वाला नागरिक भी समझ रहा हूँ, जिसका मुझे हमेशा अभिमान रहा है ।
ऐसे में मेरा सिर्फ़ स्पष्टीकरण और माफीनामा ही नाकाफी होगा । नारी अस्मिता , अधिकार ,विमर्श और सम्मान के मेरे किए गए दशक भर के प्रयासों पर मैं इसे कलंक मानता हूँ, अपराधी तो हूँ ही । खाश कर यह जान लेने के बाद की 'शमा' इस प्रकरण में असहाय भले ही रहीं हों,अपराध लिप्त नहीं । और शायद अपराध तो उनके साथ भी हुआ है । उन्हों ने इस घटना पर जो कुछ कहा है वही सच्चाई मानी जानी चाहिए और न्यायिक प्रक्रिया जो भी हो ,किसी को भी उन्हें और किसी तरह से अपराधी मानना एक अनाधिकार चेष्ठा ही नहीं ,अपने आप में भी एक अपराध ही है।
बताना फ़र्ज़ समझता हूँ की अपने द्वारा जो भी जानकारी मिली है उसका उचित संज्ञान कर चुका हूँ । और इसके अलावा मेरा किया हुआ हर एक काम मुझे ज्यादा से ज्यादा सिर्फ़ माफी का ही हक दे सकता है और वह माफी भी सिर्फ़ श्रीमती रिज़वाना 'शमा' कश्यप ही दे सकती हैं ।
इस पूरे प्रकरण में यदि उन व्यक्तियों और परिस्थितियों का विवरण शायद देता तो पाठकों के लिए बात समझनी और आसान होती पर वह और भी अनुचित और अनैतिक होता, क्योंकि उस से अवांछित चर्चा होने के खतरे बढ़ जाते । इसलिए अगर चाहें तो 'शमा' जी ही कहें, मेरे कहने से मेरे इस विनम्र प्रयास को हानि ही पहुंचेगी ।
आख़री बात । यह सम्पूर्ण वृतांत हम ब्लोगरों के लिए एक सबक भी है की किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो जल्दबाजी में कुछ लिखा पढ़ा जाना और चर्चा करना कितना दुष्परिणाम कारी और असंस्कृत हो सकता है । आधुनिक विज्ञानं ने अपनी अभिव्यक्ति का जो मंच हमें दिया है , वह भी हमारा ही दायित्व है की उसे 'सत्यम, शिवम्, सुन्दरम' की संस्कृति और गरिमा से परिपूर्ण रखें और बहक न जायें । व्यक्तिगत चर्चा से तो बिल्कुल ही बचा जाए । आशा है की'शमा' जी आप भी इसे समझ रही होंगी ।
'शमा' मैं तुमसे खूलेआम छमा मांगता हूँ और जो भी पीड़ा पहुंचाई है, उसके लिए उत्तरदायी हूँ । उम्मीद है की अपनी विशाल हृदयता का परिचय दे किसी दिन आप माफ़ भी कर सकें ।
वह पोस्ट मैंने हटा दी है । कुछ और पोस्टें भी जो सम्बंधित थीं ,जिनमे गंभीर आरोप थे। 'शमा' पर एक अपराधिक षडयंत्र का आरोप। एक मानव जीवन को नष्ट करने के कारण बन जाने के 'अपराधिक षडयंत्र ' का आरोप । उनकी चारित्रिक त्रुटियों को इंगित करना मेरा मकसद न कभी रहा , न था ।स्वभावतः और अपने विश्वास के तहत , मैं बता दूँ की कभी किसी के चरित्र का मापदंड निर्धारण करना मैं अनुचित ही नहीं अनैतिक मानता हूँ और किसी नारी का तो कभी भी नहीं . मेरे पास किसी भी व्यक्ति का व्यक्तिगत सम्बन्ध और चरित्र मापने का कोई भी थर्मामीटर नहीं है न अपने बारे में ही किसी को यह हक देता हूँ ।
पिछले ५ महीनों से मैं उनके सानिध्य में आया । उनको जानने समझने का मौका मिला । उनसे आत्मीयता भी हुयी । उनसे प्रोफेसनली जुडाव भी हुआ । हमने एक डाकुमेंट्री फ़िल्म निर्माण की योजना भी बनाई । उसके आलेख लिखे गए और रूपरेखा बनाई गयी ।
ये बताना भी जरूरी समझता हूँ की अक्टूबर २००८ के पहले मैं न उनको जानता था न ही उनके परिवार और परिवेश से ही परिचित था । उनसे पहचान भी उनके ब्लॉग लेखन से ही हुयी , वह भी ये जानने के बाद की वह भी फ़िल्म निर्माण से जुडी हैं । हमारे ईमेल से संपर्क बने । मैं भी फ़िल्म निर्माण से जुड़ा हूँ और एक फ़िल्म का निर्माण निर्देशन भी कर रहा हूँ । महत्वपूर्ण था मेरे लिए मेरा अपना काम ही ।
न्यू यार्क से भारत आने के बाद उनसे मुलाकात हुयी और फ़िल्म निर्माण पर प्रोफेसनल चर्चा सत्र हुए । मैंने पाया की लेखन ,कास्तुम, कला और निर्मिती से सम्बंधित अन्य छेत्रों में उनका सहयोग और योगदान सहभागी हो सकते हैं । और उनके लघुचित्र निर्माण का अनुभव उपलब्धी एक अच्छे सहकारी सहायक की योग्यता रखते हैं ।
संयोग वश उन्हीं दिनों मुंबई के आतंकवादी हमले हुए । 'शमा' ने आतंकवाद ,आतंरिक पुलिस सुरक्छा और वर्तमान कानूनी प्रावधानों पर एक लघु चित्र की परिकल्पना की । विषय समयोचित और वर्तमान परिस्थितियों में बहुत महत्वपूर्ण था ।
मैंने निर्माण की जिम्मेदारी ली और विषय वस्तु तथा आलेख में उनकी सहायता का काम लिया । 'शमा' ने अपने ब्लॉग लेखन पर इसका उल्लेख भी किया और कई व्यक्तियों ने हमारी हौसला अफजाई भी की । हमने पूरी रूप रेखा बनाई और विभिन्न डिटेल्स भी पूरे किए । बाकी का काम उन्हें ही करना था क्योंकि सीमित समय में मुझे अपने मुख्य फ़िल्म का काम करना था । इस बीच उनके परिवार जनो से भी आत्मीयता हुयी । 'शमा' की कलात्मकता पर मैंने उसी बीच अपने ब्लॉग पे भी लिखा।
दुर्भाग्य ये रहा की उसी बीच 'शमा' बीमारी के चलते काम आगे न बढ़ा पायीं और मैं अपने कामों में मुम्बई में मशगूल रहा । इन कलात्मक कामों में समय सीमा निर्धारित करना बहुत मुश्किल होता है फ़िर भी एक वक़्त की एक डिसिप्लिन भी जरूरी होता है । उनके परिवार के सदस्यों ने भी महसूस किया की इन शारीरिक मानसिक हालातों में वे इस मेहनत के काम को नहीं अंजाम दे सकतीं ।शायद वे इरादतन नहीं चाहते थे की 'शमा' इस काम को करें . मैं भी उनके पारिवारिक कलह का हिस्सा नहीं बनना चाहता था ।
आकलन मेरा यह भी रहा की शायद इस वक़्त इन हालातों में यह काम रोक दूँ क्योंकि मेरी संलिप्तता के बिना 'शमा' इसे अंजाम नहीं दे सकतीं और मैं किसी भी हालत में ख़ुद अपने वक़्त देने में असमर्थ हूँ । मैंने 'शमा' को अवगत कराया की फिलहाल इसे करना सम्भव नहीं है ।
मेरा दुर्भाग्य की 'शमा' ने इसे हेठी समझा , अपना अपमान समझा , मेरी वादाफरामोशी माना और बिफर गयीं । सीधे अपनी पोस्ट पे जा , बिना नाम लिए लिखा अपनी पोस्ट 'अंतराल' । स्वर उसका यह था की मैंने काम का वादा कर उनसे मौका छीन लिया ।जबाब में मैंने उन्हें अनाम टिप्पणी दी की यह दुष्प्रचार न करें और लिखना ही है तो पूरी सच्चाई लिखें । जबाब में जो कुछ आया वह दुर्भाग्यपूर्ण था ,अवांछित भी । फ़िर हमने एक दूसरे पर आरोप लगते कई टिप्पणियां और पोस्टें लिखीं ।
लेकिन जो सबसे महत्वपूर्ण था वह साल भर पहले घटी वो घटना के बारे में था । 'शमा' ने उस घटना के बारे में अपनी पोस्ट 'दुविधा ' पर लिखा । मुझे जो जानकारियां मिलीं थीं वह सत्य उस घटना का 'सत्य' कुछ और बताती थीं । अतः मामले को गंभीर अपराध समझते मैंने अपनी पोस्ट पर लिखा । अपने विश्वास और पाई जानकारी के अनुसार वह अपराध पर परदा डालने का प्रयास था । मेरे लेखन में वही प्रकट भी हुआ ।
लेकिन सच्चाई क्या वही थी जो मैंने लिखी ? या भले वही होती तब भी क्या मुझे स्वयं यह पोलिसिंग करने का अधिकार मिल गया था ? क्या यह नैतिक था की किसी घटना पर अपने जाने सत्य और विश्वास पे , अपने प्रयासों से पाई सूचना (या किन्ही लोगों द्वारा दी गयी जानकारी ,शायद जानबूझकर ) को शायद पूरा सच मानते हुए सीधे ब्लॉग पर लिखता ? वह भी स्वयं जज ,जूरी और अभियोक्ता बन निर्णय सुनाता ? वह भी ,जहाँ अपराध की बात मान भी ली जाए तब भी, एक संभ्रांत नारी जो मित्र और सहायक भी रह चुकी थीं , उनके व्यक्तिगत जीवन को दर्शित कर एक तरह से नैतिक और चारित्रिक दोषारोपण करता ? (यद्यपि वह इरादा कभी नहीं था, तब भी, बात सिर्फ़ सामाजिक और कानूनी दायित्व की थी ,और यह बात मैंने बार बार कही भी ) । निश्चित रूप से ,नैतिक और कानूनी भी, सत्य का मेरा वह मेरा वह भ्रमित आत्मविश्वास और प्रतिक्रिया जल्दबाजी में की गयी नासमझी और उस नासमझी से उपजी असंस्कृत ,संस्कारहीन मूर्खता ही नहीं थी ? एक गैर जिम्मेदाराना काम नहीं था जिसके दूरगामी परिणाम हो सकते थे, शायद हुए भी ,और जिन्हें सुधार कर लौटाना सम्भव नहीं था ?
मुझ पर कोई दबाव नहीं पर मैं नयी परिस्थितियों में स्वयं को ही कठघरे में खड़ा पा रहा हूँ और अपने स्वयं के मानदंडों के हिसाब से ,अपने ही मानदंडों पर एक बहुत ही गैर जिम्मेदार इन्सान ही नहीं, एक नागरिक कर्तव्यों की अवहेलना करने वाला नागरिक भी समझ रहा हूँ, जिसका मुझे हमेशा अभिमान रहा है ।
ऐसे में मेरा सिर्फ़ स्पष्टीकरण और माफीनामा ही नाकाफी होगा । नारी अस्मिता , अधिकार ,विमर्श और सम्मान के मेरे किए गए दशक भर के प्रयासों पर मैं इसे कलंक मानता हूँ, अपराधी तो हूँ ही । खाश कर यह जान लेने के बाद की 'शमा' इस प्रकरण में असहाय भले ही रहीं हों,अपराध लिप्त नहीं । और शायद अपराध तो उनके साथ भी हुआ है । उन्हों ने इस घटना पर जो कुछ कहा है वही सच्चाई मानी जानी चाहिए और न्यायिक प्रक्रिया जो भी हो ,किसी को भी उन्हें और किसी तरह से अपराधी मानना एक अनाधिकार चेष्ठा ही नहीं ,अपने आप में भी एक अपराध ही है।
बताना फ़र्ज़ समझता हूँ की अपने द्वारा जो भी जानकारी मिली है उसका उचित संज्ञान कर चुका हूँ । और इसके अलावा मेरा किया हुआ हर एक काम मुझे ज्यादा से ज्यादा सिर्फ़ माफी का ही हक दे सकता है और वह माफी भी सिर्फ़ श्रीमती रिज़वाना 'शमा' कश्यप ही दे सकती हैं ।
इस पूरे प्रकरण में यदि उन व्यक्तियों और परिस्थितियों का विवरण शायद देता तो पाठकों के लिए बात समझनी और आसान होती पर वह और भी अनुचित और अनैतिक होता, क्योंकि उस से अवांछित चर्चा होने के खतरे बढ़ जाते । इसलिए अगर चाहें तो 'शमा' जी ही कहें, मेरे कहने से मेरे इस विनम्र प्रयास को हानि ही पहुंचेगी ।
आख़री बात । यह सम्पूर्ण वृतांत हम ब्लोगरों के लिए एक सबक भी है की किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो जल्दबाजी में कुछ लिखा पढ़ा जाना और चर्चा करना कितना दुष्परिणाम कारी और असंस्कृत हो सकता है । आधुनिक विज्ञानं ने अपनी अभिव्यक्ति का जो मंच हमें दिया है , वह भी हमारा ही दायित्व है की उसे 'सत्यम, शिवम्, सुन्दरम' की संस्कृति और गरिमा से परिपूर्ण रखें और बहक न जायें । व्यक्तिगत चर्चा से तो बिल्कुल ही बचा जाए । आशा है की'शमा' जी आप भी इसे समझ रही होंगी ।
'शमा' मैं तुमसे खूलेआम छमा मांगता हूँ और जो भी पीड़ा पहुंचाई है, उसके लिए उत्तरदायी हूँ । उम्मीद है की अपनी विशाल हृदयता का परिचय दे किसी दिन आप माफ़ भी कर सकें ।
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